चैप्टर 12 देवदास : शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास | Chapter 12 Devdas Novel By Sharat Chandra Chattopadhyay

Chapter 12 Devdas Novel In Hindi

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कलकत्ता आये हुए डेढ़ महीना हो गया। आज उसके ब्रह्म प्रसन्न हुए। रात के ग्यारह बज गये थे, हताश मन से वह घर लौट रही थी। इतने में ही देखा, रास्ते के एक ओर दरवाजे के सामने एक आदमी आप-ही-आप कुछ बड़बड़ा रहा है। इस कंठ-स्वर से वह भली-भांति परिचित थी। करोड़ो लोगों के बीच में भी वह उस स्वर को पहचान सकती थी। उस स्थान पर कुछ अंधकार था, वही पर कोई मनुष्य नशे में चूर पड़ा हुआ था। चंद्रमुखी ने पास जाकर शरीर पर हाथ रखकर पूछा-‘तुम कौन हो, जो यहाँ पर इस तरह पड़े हो?’

उस मनुष्य ने ज़ोर से कहा-‘सुनो तो सही मेरे मन की बातें, यदि पाऊं मैं अपने स्वामी को।’

चंद्रमुखी को अब और कुछ संदेह नहीं रहा, उसने पुकारा-‘देवदास!’

देवदास ने उसी भांति कहा-‘हूं?’

‘यहाँ क्यों पड़े हो, घर चलोगे?’

‘नहीं, अच्छी तरह हूँ।’

‘थोड़ी शराब पियोगे?’

‘हाँ पिऊंगा’-कहकर एकाएक चंद्रमुखी का गला जकड़ लिया, कहा-‘ऐसी भलाई करने वाले तुम कौन हो भाई?’

चंद्रमुखी की आँखों से आँसू गिरने लगे। बड़े परिश्रम के साथ गिरते-पड़ते चंद्रमुखी के कंधे का सहारा लेकर उठे। कुछ देर मुख की ओर देखने के बाद कहा-‘भाई यह बड़ी अच्छी चीज है।’

चंद्रमुखी ने आह भरी हँसी हँसकर कहा-‘हाँ, बड़ी अच्छी चीज है। ज़रा मेरे कंधे का सहारा लेकर कुछ आगे चलो, एक गाड़ी ठीक करनी होगी।’

‘गाड़ी क्या होगी?’-रास्ते मे आते-आते देवदास ने बैठे हुए गले से कहा-‘सुंदरी, तुम मुझे पहचानती हो?’

चंद्रमुखी ने कहा-‘पहचानती हूँ।’

देवदास ने हकलाते हुए कहा-‘और लोगों ने तो मुझे भुला दिया है, भाग्य है जो तुम पहचानती हो।’

फिर गाड़ी पर सवार होकर, चंद्रमुखी के शरीर पर बोझ दिये ही घर पर आये। दरवाजे के पास खड़े होकर जेब मे हाथ डालकर कहा-‘सुंदरी; गाड़ी तो ले आयी, किन्तु जेब में कुछ नहीं है।’

चंद्रमुखी ने कोई उत्तर नही दिया। चुपचाप हाथ पकड़े हुए ऊपर लाकर लिटाकर कहा-‘सो जाओ।’

देवदास ने उसी भांति बैठे हुए गले से कहा-‘क्या कुछ चाहिए नहीं?

मैने जो कहा कि जेब खाली, कुछ मिलने की आशा नहीं है। समझी सुंदरी?’

सुंदरी उसे समझ गयी, कहा-‘कल देना।’

देवदास ने कहा-‘इतना विश्वास तो ठीक नहीं। क्या चाहिए, खुलकर कहो?’

चंद्रमुखी ने कहा-‘कल सुनना।’-यह कहकर वह बगले के दूसरे कमरे में चली गयी।

देवदास की जब नींद टूटी तो दिन चढ़ गया था। घर में कोई नहीं था। चंद्रमुखी स्नान करके भोजन पकाने की तैयारी में थी। देवदास ने चारो ओर आश्चर्य से देखा कि इस स्थान में वे कभी नहीं आये थे, एक चीज भी नहीं पहचान सके। पिछली रात की एक बात भी याद नहीं आती थी; केवल किसी की आंतरिक सेवा का कुछ-कुछ स्मरण आता था। किसी ने मानो बड़े स्नेह के साथ लाकर सुला दिया।

इसी समय चंद्रमुखी ने घर मे प्रवेश किया। रात की सज-धज में इस समय बहुत कुछ परिवर्तन हो गया था। शरीर पर गहने तो अब भी वे ही थे। किन्तु रंगीन साड़ी, माथे का टीका, मुख में पान का दाग आदि कुछ भी नहीं थे। केवल एक धोई हुई श्वेत साड़ी पहने हुए वह घर में आयी। देवदास चंद्रमुखी को देखकर खिल उठे, बोले-‘कहाँ से कल मुझे यहाँ बुला ले आयी?’

चंद्रमुखी ने कहा-‘बुला नहीं लायी, रास्ते में तुम्हे पड़ा हुआ देखकर उठा ले आयी।’

देवदास ने कुछ गंभीर होकर कहा-‘अच्छा, यह तो हुआ सो हुआ, पर तुम्हें यहाँ कैसे पाता हूँ? तुम कब आयी? तुम तो गहना नहीं पहनती थी, फिर कैसे पहनने लगी?’

चंद्रमुखी ने देवदास के मुख पर एक तीव्र दृष्टि डालकर कहा-‘फिर से…!’

देवदास ने हँसकर कहा-‘नहीं-नहीं, यह हो नहीं सकता; ऐसी हँसी करने में भी दोष है। आयी कब?’

चंद्रमुखी ने कहा-‘डेढ़ महीना हुआ।’

देवदास ने मन-ही-मन कुछ हिसाब लगाया, फिर कहा-‘मेरे मकान से लौटने के बाद ही यहाँ पर आयी?’

चंद्रमुखी ने विस्मित होकर कहा-‘तुम्हारे घर पर मेरे जाने की खबर तुम्हें कैसे मिली?’

देवदास ने कहा-‘तुम्हारे लौटने के बाद ही मैं मकान पर गया था। एक दासी से, जो तुम्हें बड़ी बहू के पास ले गयी थी, सुनने में आया कि कल अशथझूरी गाँव से एक बड़ी सुंदर स्त्री आयी थी। फिर समझना कितना कठिन था? किन्तु इतना गहना कहाँ से गढ़ाया?’

चंद्रमुखी ने कहा-‘गढ़ाया नहीं; ये सब गिलट के गहने हैं,इन्हें कलकत्ता में आकर खरीदा है।

तुम्हें देखने के लिए मैंने कितना फिजूल खर्च किया है, और कल तो तुम मुझे पहचान भी नहीं सके।’

देवदास ने हँसकर कहा-‘एकबारगी नहीं पहचान सका, कोशिश करने पर पहचाना था। कई बार मन मे आया कि चंद्रमुखी को छोड़कर मेरी ऐसी सेवा कौन करेगा?’

मारे हर्ष के चंद्रमुखी को रोने की इच्छा हुई। कुछ देर तक चुप हो रहने के बाद कहा-‘देवदास, मुझसे अब वैसी घृणा करते हो या नहीं?’

देवदास ने जवाब दिया-‘नहीं, वरन्‌ प्रेम करता हूँ।’

दोपहर मे स्नान करने के समय चंद्रमुखी ने देखा कि देवदास की छाती में एक फलालेन का टुकड़ा बंधा है। भयभीत होकर पूछा-‘यह क्या फलालेन क्यों बांधा है?’

देवदास ने कहा-‘छाती में एक प्रकार की पीड़ा होती है, तुम तो सुख से हो?’

चंद्रमुखी ने सिर धुनकर कहा-‘सर्वनाश करना चाहते हो क्या? फेफड़े में पीड़ा है?’

देवदास ने हँसकर कहा-‘ चंद्रमुखी ऐसा ही कुछ है। उसी दिन डॉक्टर ने आकर बहुत देर तक परीक्षा करने के बाद यही आशंका स्थिर की। औषध लिख दी तथा बताया कि यदि विशेष सावधानीपूर्वक न रहा जायेगा, तो भारी अनिष्ट होने की संभावना है। दोनों ही ने इसका तात्पर्य समझा। पत्र द्वारा घर से धर्मदास को बुलाया गया और चिकित्सा के लिए बैंक से रुपया आया। दो दिन इसी भांति बीत गये, किन्तु तीसरे दिन ज्वर का आविर्भाव हुआ।’

देवदास ने चंद्रमुखी को बुलाकर कहा-‘बड़े अच्छे समय से आयी, नहीं तो मुझे यहाँ कौन देखता?’

आँसू पोंछकर चंद्रमुखी प्राणपण से सेवा करने बैठी। दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना की-‘भगवान्‌, ऐसे असमय में इतना काम आ पड़ेगा, यह स्वह्रश्वन में भी आशा नहीं थी। किन्तु देवदास को शीघ्र अच्छा कर दो!’

प्रायः एक मास से ऊपर अधिक देवदास चारपाई पर पड़े रहे, फिर धीरे-धीरे आरोग्य होने लगे। रोग अधिक बढ़ने नहीं पाया।

इसी समय एक दिन देवदास ने कहा-‘ चंद्रमुखी, तुम्हारा नाम बहुत बड़ा है। पुकारने मे कुछ असुविधा-सी होती है, इसे थोड़ा छोटा कर देना चाहता हूँ।’

चंद्रमुखी ने कहा-‘अच्छी बात है।’

देवदास ने कहा-‘आज से तुम्हे ‘बहू’ कह के पुकारूंगा।’

चंद्रमुखी हँस पड़ी, कहा-‘इसे पुकारने का कोई मतलब भी होना चाहिए।’

‘क्या सभी बातो का मतलब हुआ करता है? मेरी इच्छा।’

‘यदि इच्छा ही है तो कहो। किन्तु यह इच्छा कैसी, यह तो कहो!’

‘नहीं कारण मत पूछो।’

चंद्रमुखी ने सिर नीचा करके कहा-‘अच्छी बात है, यही सही।’

देवदास ने बहुत देर तक चुप रहने के बाद हठात्‌ गंभीर भाव से पूछा-‘अच्छा बहू, तुम मेरी कौन हो, जो इतने प्राणपण से मेरी सेवा करती हो?’

चंद्रमुखी न तो लज्जाशील वधू ही है और न बातचीत मे अनभ्यस्त बालिका; देवदास के मुख की ओर स्थिर-शांत दृष्टि रखकर स्नेह-जड़ित कंठ से कहा-‘तुम मेरे सर्वस्व हो, क्या यह अब भी नहीं समझ सके?’

देवदास दीवाल की ओर देख रहे थे। उसी ओर देखते हुए धीरे-धीरे कहा-‘यह सब समझता हूँ, किन्तु इससे आनंद नहीं मिलता। पार्वती को मैं कितना ह्रश्वयार करता था और वह भी मुझे कितना ह्रश्वयार करती थी, पर इससे अंत में मिला कष्ट ही। बहुत दुख पाने पर सोचा था कि अब कभी प्रेम के फंदे मे पां वनहीं दूंगा। जानते हुए दिया भी नहीं। परन्तु तुमने यह क्या किया? जोर देकर फिर उसमे मुझे क्यों फंसाया?-यह कहकर कुछ क्षण चुप रहने के बाद फिर कहा-‘बहू, जान पड़ता है, तुम भी पार्वती की भांति दुख उठाओगी।’

चंद्रमुखी मुख पर आंचल देकर चारपाई के एक ओर चुपचाप बैठी रही।

देवदास ने फिर मृदु-कंठ से कहना आरंभ किया-‘तुम दोनों में कितनी विषमता है। एक कितनी अभिमानिनी और उद्धत है और दूसरी कितनी शांत और कितनी संयम है। वह कुछ भी नहीं सह सकती और तुम कितना सहती हो! उसका कितना यश और कितना नाम है और तुम कितनी कलंकिता हो!

सभी उसे ह्रश्वयार करते है, पर तुम्हें कोई ह्रश्वयार नहीं करता! फिर मैं ह्रश्वयार करता हूँ-‘कैसे करता हूँ!’

कहकर एक दीर्घ निःश्वास फेंककर फिर कहा-‘पाप-पुण्य के विचारकर्ता तुम्हारा कैसा विचार करेगे, यह नहीं कह सकता, पर मृत्यु के बाद यदि मिलन होगा, तो मैं तुमसे कभी दूर नहीं रहूंगा।’

चंद्रमुखी भीतर-ही-भीतर रो पड़ी, दिल बड़ा छोटा हो गया, मन-ही-मन प्रार्थना करने लगी‘भगवान! किसी काल या किसी जन्म में अगर इस पापिष्ठा का प्रायश्चित हो जाये, तो मुझे इन्हें ही पुरस्कार में देना!

दो महीने बीत गये। देवदास आरोग्य हो गये, पर अभी शरीर नहीं भरा। वायु-परिवर्तन आवश्यक था।

कल पश्चिम की ओर जायेंगे, साथ में केवल धर्मदास रहेगा।

चंद्रमुखी ने देवदास का हाथ पकड़कर कहा-‘तुम्हें एक दासी भी तो चाहिए-मुझे साथ लेते चलो।’

देवदास ने कहा-छिः! यह क्या हो सकता है? और जो चाहे सो करूं, परन्तु इतनी बड़ी निर्लज्जता नहीं कर सकता।’’

चन्द्रमुखी चुप हो रही। वह अबूझ नहीं है, सब बातें सहज ही समझ गयी, और जो हो, पर इस संसार में उसका सम्मान नहीं है, उसके रहने से देवदास की अच्छी सेवा होगी, सुख मिलेगा, किन्तु कहीं भी सम्मान नहीं मिलेगा। आँख पोंछकर कहा-‘अब फिर कब देख सकूंगी?’

देवदास ने कहा-‘यह नहीं कह सकता। चाहे कही भी होऊं, परन्तु तुम्हें भूलूंगा नहीं, तुम्हें देखने की तृष्णा कभी मिटेगी नहीं।’

प्रणाम करके चन्द्रमुखी अलग खड़ी हो गयी। मन-ही-मन कहा-यही मेरे लिए यथेष्ट है, इससे अधिक आशा करना व्यर्थ है।’

जाने के समय देवदास ने चन्द्रमुखी के हाथ मे और दो हजार रुपये रखकर कहा-‘इन्हें रखो। मनुष्य के शरीर का कोई विश्वास नहीं है, पीछे तुम दुख-सुख में किसके आगे हाथ पसारोगी?’

चन्द्रमुखी ने इसे भी समझा, इसी से रुपया ग्रहण कर लिया। आँसू पोंछकर पूछा-‘तुम एक बात मुझे बताते जाओ।’

देवदास ने मुख की ओर देखकर कहा-‘क्या?’

चन्द्रमुखी ने कहा-‘बड़ी बहू, तुम्हारी भाभी ने कहा था कि तुम्हारे शरीर मे बुरा रोग उत्पन्न हो गया है, यह क्या सच है?’

प्रश्न सुनकर देवदास को दुख हुआ, कहा-‘बड़ी बहू सब कह सकती है, किन्तु क्या तुम नहीं जानती? मेरा कौन-सा भेद तुम नहीं जानती? एक विषय में तो पार्वती से भी बढ़ी हुई हो।’

चन्द्रमुखी ने एक बार आँख पोंछकर कहा-‘सब समझ गयी। परन्तु फिर भी खूब सावधानी से रहना।

तुम्हारा शरीर निर्बल है, देखो किसी प्रकार की त्रुटि न होने पावे।’ प्रत्युत्तर मे देवदास ने केवल हँस दिया।

चंद्रमुखी ने कहा-‘और एक भिक्षा है, तनिक भी तबीयत खराब होने पर मुझे खबर अवश्य देना।‘

देवदास ने उसके मुख की ओर देखकर सिर नीचा करके कहा-‘दूंगा-अवश्य दूंगा बहू।’ फिर एक बार प्रणाम करके चंद्रमुखी रोती हुई दूसरे कमरे में चली गयी।

 

कलकत्ता से आकर देवदास कुछ दिन इलाहाबाद रहे। उसी बीच उन्होंने चंद्रमुखी को एक चिट्ठी लिखी-‘बहू, मैंने विचार किया है कि अब किसी से प्रेम न करूंगा। एक तो प्रेम करके खाली हाथ लौटने से बड़ी यातना मिलती है, दूसरे इस संसार में प्रेम का पथ ही दुख और दैन्य से पूर्ण है।’

इसके उत्तर में चंद्रमुखी ने क्या लिखा, इसके लिखने की यहाँ आवश्यकता नहीं है, पर इस समय देवदास मन-ही-मन केवल यही सोचते रहते थे कि एक बार उसका यहाँ आना ठीक होगा या नहीं?

दूसरे ही क्षण सोचते-‘नहीं-नहीं, कोई काम नहीं है। यदि किसी दिन पार्वती सुन लेगी, तो क्या कहेगी? इस भांति कभी पार्वती और कभी चंद्रमुखी उनके हृदय-आवास में वास करती थी। और कभी दोनों के ही सुख एक साथ उनके हृदय-पट पर अंकित होते थे…

हृदय ऐसा शून्य हो जाता था कि केवल एक निजीव अतृप्ति उनके हृदय में मिथ्या प्रतिध्वनि की भांति गूंज उठती थी। इसके बाद देवदास लाहौर चले गये। वहाँ चुन्नीलाल नौकरी करते थे, खबर पाकर भेट करने के लिए आये। बहुत दिनों के बाद आज दोनों मित्र एक-दूसरे को देखकर लज्जित और साथ ही सुखी हुए। फिर देवदास ने शराब पीना शुरू किया। चंद्रमुखी की छाया उनके मन में बनी हुई थी, उसने शराब का निषेध किया था। सोचते, वह कितनी बड़ी बुद्धिमती है! कैसी धीरा और शांत है, कितना उसका स्नेह है! पार्वती इस समय स्वह्रश्वनवत्‌ विस्मृत हो रही थी-केवल बुझते हुए दीप के समान जब-तब उसकी स्मृति भभक उठती थी। परन्तु यहाँ की जलवायु उनके अनुकूल नहीं पड़ी। बीच-बीच में बीमार पड़ने लगे, छाती में फिर कड़क जान पड़ती थी। धर्मदास ने एक दिन रोते-रोते कहा-‘देवता, तुम्हारा शरीर फिर गिर चला, इसलिए और कहीं चलो!’

देवदास ने अनमने भाव से जवाब दिया-‘अच्छा, चला जायेगा।’

देवदास प्रायः घर पर शराब नहीं पीते। किसी दिन चुन्नीलाल के आने पर पीते है और किसी दिन बाहर चले जाते है। रात के तीसरे-चौथे पहर घर लौटते थे और किसी-किसी दिन नहीं भी आते थे।

आज दो दिन से उनका पता नहीं है। मारे शोक के धर्मदास ने अब तक अन्न-जल भी नहीं ग्रहण किया।

तीसरे दिन वे ज्वर लेकर घर लौटे। चारपाई पकड़ ली। तीन डॉक्टरो ने आकर चिकित्सा आरंभ की।

धर्मदास ने पूछा-‘देवता काशी में माँ को यह खबर भेज दूं?’ देवदास ने तत्काल बाधा देकर कहा-‘छिः-छिः! माँ को क्या यह मुँह दिखाने लायक है?’

धर्मदास ने इसके प्रतिवाद मे कहा-‘रोग-शोक तो सभी को होते है, पर क्या इसी से इतने बड़े दुख को माँ से छिपाया जा सकता है?तुम्हें कोई लज्जा नहीं है देवता, काशी चलो।’

देवदास ने मुँह फिराकर कहा-‘नहीं धर्मदास, इस समय उनके पास नहीं जा सकूंगा। अच्छा होने के बाद देखा जायेगा।’

धर्मदास ने मन मे सोचा कि चंद्रमुखी की चर्चा करे, किन्तु वह स्वयं ही उससे इतना घृणा करता था कि यह विचार उठने पर भी वह चुप ही रहा।

देवदास की चंद्रमुखी को बुलाने की स्वयं भी इच्छा होती थी, पर कह कुछ नहीं सकते थे। अस्तु, कोई आया नहीं। कुछ दिन के बाद धीरे-धीरे आरोग्य होने लगे। एक दिन उन्होंने धर्मदास से कहा‘अगर तुम्हारी इच्छा हो, तो चलो इस बार और कही चला जाये.’

इस समय और कहीं चलने की जरूरत नहीं है, अगर हो सके तो घर चलो, नहीं तो माँ के पास चलो।’

माल-असबाब बांधकर, चुन्नीलाल से विदा लेकर, देवदास फिर इलाहाबाद चले आये। शरीर इस समय भली-भांति अच्छा हो गया था। कुछ दिन रहने के बाद उन्होंनेएक दिन धर्मदास से कहा-‘धर्म, किसी नयी जगह नहीं चलोगे? अभी तक बम्बई नहीं देखी, वहाँ चलोगे?’

उनका अतिशय आग्रह देखकर इच्छा न रहते हुए भी धर्मदास बम्बई चलने को तैयार है….

यहाँ आकर देवदास को बहुत कुछ आराम मिला।

एक दिन धर्मदास ने कहा-‘यहाँ रहते बहुत दिन हो गये, अब घर चलना अच्छा होगा।’

देवदास ने कहा-‘नहीं, यहाँ अच्छी तरह हूँ। अभी कुछ दिन यहाँ और रहूंगा।’

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