चैप्टर 113 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 113 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

चैप्टर 113 वैशाली की नगरवधु आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास | Chapter 113 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

Chapter 113 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

Chapter 113 Vaishali Ki Nagarvadhu Acharya Chatursen Shastri Novel

112 . चाण्डाल मुनि का कोप : वैशाली की नगरवधू

हरिकेशीबल के वहां चले जाने पर भी वह तथाकथित राजकन्या वहां से नहीं गई । बहुत प्रकार से ब्राह्मणों को डराती – धमकाती रही। उसने कहा – “ हे ब्राह्मणो, तुमने अच्छा नहीं किया जो चाण्डाल मुनि को भिक्षा के काल में भिक्षा नहीं दी , उसे अपशब्द कहे , पीटा , उसे विरत किया । अब भी समय है, तुम उसके चरणों में पड़कर प्राण-भिक्षा मांग लो , नहीं तो मन्द कान्तार का यक्ष आज आप लोगों को जीवित नहीं छोड़ेगा। ”

बहुत से ब्राह्मण डर गए। बहुत संदिग्ध भाव से उस रूपसी बाला की बात सुनते रहे । कुछ ही देर में वे सब फिर कहने लगे – “ वाह, यह सब माया यहां नहीं चलेगी । हम ब्राह्मण वेदपाठी क्या उस काणे चाण्डाल के पैर छुएंगे! ”

सुन्दरी क्रुद्ध होती हुई चली गई । बहुत जन रूपसी के रूप की और कुछ उसकी अद्भुत वार्ता की आलोचना करते रहे। भोजन की वेला हुई और ब्राह्मण पंक्ति में बैठे ; ब्राह्मण- भोजन प्रारम्भ हुआ । भोजन के बाद स्वर्णवस्त्र उन्हें बांटे गए । परन्तु यह क्या आश्चर्य – चमत्कार हुआ , देखते – ही – देखते सभी ब्राह्मण उन्मत्तों की – सी चेष्टा करने लगे । वे हंसने -नाचने और अट्टहास करने लगे , अपने भूषण- वस्त्र उतार – उतारकर नंगे हो , बीभत्स और अश्लील चेष्टाएं करने लगे । बहुत लोग रक्त -वमन कर मूर्छित होने लगे। बहुत जन कटे काष्ठ के समान भूमि पर गिरकर पटापट मरने लगे ।

सोमिल ने भयभीत होकर आर्य वर्षकार से कहा- “ आर्य, यह सब क्या हो गया । ”

“ ठीक नहीं हुआ सोमिल , चाण्डाल मुनि का कोप ब्राह्मणों पर हुआ। सम्भवत : यक्ष ने कुपित होकर ब्राह्मणों को मार डाला है। ”

“ तो आर्य, अब क्या करना चाहिए। ”

“ सोमिल , सब ब्राह्मणों को लेकर तुम नन्दन साहु के घर पर जाकर जितेन्द्रिय मुनि की स्तुति करके उसे प्रसन्न करो, इसी में कल्याण देखता हूं। ”

तब सोमिल बहुत – से ब्राह्मणों को संग ले नन्दन साहु के घर पहुंचा जहां वह कुत्सित चाण्डाल मुनि उच्चासन पर बैठा आनन्द से विविध पक्वान्न और मिष्टान्न खा रहा था । उसे देख , हाथ जोड़, सोमिल को आगे कर सब ब्राह्मणों ने कहा – “ हे भदन्त , हमें क्षमा करो , हम मूढ़ और अज्ञानी बालक के समान हैं । हम सब मिलकर आपकी चरण – वन्दना करते हैं । हे महाभाग , हम आपका पूजन करते हैं । आप हम सब ब्राह्मणों के पूज्य हैं । यह हम विविध प्रकार के व्यंजन , अन्न और पाक आपके लिए लाए हैं । इन्हें ग्रहण कर हमें कृतार्थ कीजिए । हे भदन्त ! हे महाभाग! हम सब ब्राह्मण आपकी शरणागत हैं । ”

चाण्डाल मुनि ने सुनकर कहा – “ हे घमण्डी ब्राह्मणो! यदि सत्य ही तुम्हें अनुताप हुआ है, तो जाओ, मन्दकान्तार जा , साणकोष्ठक चैत्य में शूलपाणि यक्ष की अभ्यर्थना- पूजन करो। उसे प्रसन्न करो । नहीं तो सम्पूर्ण वैशाली ही का नाश हो जाएगा । हे ब्राह्मणो ! अपने पाप से वैशाली को नष्ट न करो। ”

यह सुनकर सब ब्राह्मण, बटुक ब्रह्माचारी , वेदपाठी श्रोत्रिय जन सहस्रों , भीत विस्मित , चमत्कृत नागर पौरजनों की भीड़ के साथ विकट विजन मन्दकान्तार वन में साणकोष्ठ चैत्य में जा अतिभयानक शूलपाणि यक्ष की मूर्ति के सामने भूमि पर गिरकर त्राहि माम् त्राहि माम् ! कहने लगे। तब उस अन्ध गुफा से मूर्ति के पीछे से रक्ताम्बर धारण किए और शूल हाथ में लिए वही सुन्दरी बाला बाहर आई और उच्च स्वर से कहने लगी – “ अरे मूढ़ जनो ! मैं तुम सब ब्राह्मणों का आज भक्षण करूंगी। मैं यक्षिणी हूं। तुमने ब्राह्मणत्व के दर्प में मनुष्य – मूर्ति का तिरस्कार किया है ; क्या तुम नहीं जानते कि ब्राह्मण और चाण्डाल दोनों में एक ही जीवन सत्त्व प्रवाहित है, दोनों का जन्म एक ही भांति होता है, एक ही भांति मृत्यु होती है, एक ही भांति सोते हैं , खाते हैं ; इच्छा , द्वेष , प्रयत्न के वशीभूत हो सुख – दुःख की अनुभूति करते हैं । अरे मूर्यो! तुमने कहा था कि तुम्हारा तप: पूत अन्न फेंक भले ही दिया जाए, पर चाण्डाल याचक को नहीं मिलेगा ? तुम मनुष्य -हिंसक , मनुष्य हितबाधक हो , तुम मनुष्य -विरोधी हो । मरो तुम आज सब ! ”

“ त्राहि माम् , त्राहि माम् ! हे देवी , हे यक्षिणी मात :, हमारी रक्षा करो! हमने समझा था – हमारा पूत अन्न …..। ”

“ अरे मूर्यो, तुम जल से शरीर की बाह्य शुद्धि करके उसे ही महत्त्व देते हो , तुम अन्तरात्मा की शुद्धि को नहीं जानते । अरे, यज्ञ करने वाले ब्राह्मणो, तुम दर्भयज्ञ , यूप , आहवनीय , गन्ध , तृण, पशुबलि , काष्ठ और अग्नि तक ही अपनी ज्ञानसत्ता को सीमित रखते हो ; तुमने असत्य का , चोरी का , परिग्रह का त्याग नहीं किया। तुम स्वर्ण, दक्षिणा और भोजन के लालची पेटू ब्राह्मण हो , तुम शरीर को महत्त्व देते हो , शरीर की सेवा में लगे रहते हो । तुम सच्चे और वास्तविक यज्ञ को नहीं जानते । ”

“ तो यक्षिणी मात:, हमें यज्ञ की दीक्षा दीजिए।

“ अरे मूर्ख ब्राह्मणो! कष्ट सहिष्णुता तप है, वही यज्ञाग्नि है, जीवन – तत्त्व यज्ञाधिष्ठान है । मन -वचन – कर्म की एकता यज्ञाहुति है । कर्म समिधा है और आत्मतुष्टि पूर्णाहुति है। विश्व के प्राणियों में आत्मानुभूति का अनुभव कर समदर्शी होना स्वर्ग- प्राप्ति

“ धन्य है मात :! धन्य है यक्षकुमारी! हम सब ब्राह्मण तेरी शरण हैं , हमारी रक्षा करो! हमारी रक्षा करो !! ”

इसी प्रकार रुदन करते , वे सब ब्राह्मण फिर भूमि पर उस सुन्दरी के चरणों में गिर गए । तब ब्राह्मण सोमिल के सिर को शूल से छूकर उस यक्षकुमारी ने कहा – “ उठ रे ब्राह्मण , अभी तुम्हें जीवन दिया है । ”

इतना कहकर वह तेजी से यक्षमूर्ति के पीछे गुहाद्वार में जा अन्धकार में लोप हो गई; और वे ब्राह्मण तथा पौर जानपद भय , भक्ति और विविध भावनाओं से विमूढ़ बने नगर की ओर लौटे ।

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