चैप्टर 11 नकली नाक : इब्ने सफ़ी का उपन्यास हिंदी में | Chapter 11 Nakli Naak Ibne Safi Novel In Hindi

Chapter 11 Nakli Naak Ibne Safi Novel

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बच गया

रात भर जागने की वजह से नवाब रशीजुज्जमा की आँखें खुली, जब गज़ाला कुंवर ज़फ़र अली खां से रात का गुजरा हुआ किस्सा बयान कर रही थी।

“फिर आप लोग यहाँ तक इस तरह पहुँचे।” कुंवर ज़फ़र अली खां ने सवाल किया।

“हम लोगों को आँखों पर पट्टी बांधकर एक गाड़ी में बिठा दिया गया और तीन घंटे तक चलने के बाद हम एक सुनसान जगह पर उतार दिए गये। हमारे हाथों की रस्सियाँ खोल दी गई और हम लोग काफ़ी देर तक इधर-उधर भटकते रहे। फिर माथुर साहब को रास्ता याद आ गया और हम लोग यहाँ पहुँच गये।”

“लेकिन इस बुरे काम से फ़रीदी का क्या मकसद था?” कुंवर ज़फ़र अली खां कुछ सोचते हुए बोले।

“कुंवर साहब, अब उसका नाम न लीजिये। इस दुनिया में अब किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।”  गज़ाला गमगीन आवाज में बोली।

“क्या यह मुमकिन नहीं कि तुम लोगों ने धोखा खाया हो और फ़रीदी के बजाय  वह कोई दूसरा शख्स रहा हो।”

“नहीं कुंवर साहब, वह फ़रीदी ही थे। वही सूरत वही आवाज।” गज़ाला ने इंकार किया।

“और हमीद कहाँ है?” कुंवर ने सवाल किया।

“उनका कुछ पता नहीं।” गज़ाला बोली।

“अच्छा तुम आराम करो। बहुत थकी हुई मालूम होती हो। मैं ज़रा माथुर साहब के यहाँ जा रहा हूँ। फ़रीदी पर मुझे पहले ही शक था।”

“बहरहाल अब मामला खतरनाक होता जा रहा है।”

कुंवर ज़फर अली गज़ाला से विदा होकर सीधे माथुर साहब के बंगले की तरफ रवाना हो गये। कुंवर साहब अभी थोड़ी ही दूर चले होंगे कि एक गाड़ी तेजी से उनके बीच करीब ही एक कागज का टुकड़ा गिराती हुई गुज़र गई। उन्होंने उसे उठाकर पढ़ा, लिखा था :

“सुनता हूँ कि मैं फ़रीदी साहब का कैदी हूँ, लेकिन यकीन नहीं आता। आज रात को यह लोग राय बहादुर विश्वंभर नाथ की कोठी पर छापा मारने वाले हैं।

हमीद।”

कुंवर ज़फर अली खां ने वह पर्चा अपनी जेब में रखा और तेज-तेज कदम बढ़ाते हुए माथुर साहब के बंगले पर पहुँच गये।

माथुर साहब अभी-अभी सो कर उठे थे। कुंवर साहब के आने की खबर सुनकर वह फौरन बाहर आ गये।

“क्या बताऊं कुंवर साहब, रात…”

“मुझे गज़ाला से सब कुछ मालूम हो गया है। वाकई यह बहुत ही हैरतअंगेज वाकया है।”

“यकीनन!” माथुर ने कहा।

“आप किस नतीजे पर पहुँचे?” कुंवर साहब ने सवाल किया।

“भाई अभी तक तो कुछ भी सोचने और समझने का मौका नहीं मिला।” माथुर साहब ने सिगरेट का कश लगाते हुए कहा।

“हाँ…अभी जब मैं आपके यहां आ रहा था, तो एक नया वाकया पेश आया।” कुंवर साहब ने वह पर्चा दिखाया, जो मोटर कार से गिराया गया था।

माथुर ने पर्चा पढ़ते ही जल्दी से सवाल किया, “आपने मोटर कार का नंबर देखा था।”

“जब तक मैं पर्चा उठाऊं, मोटर कार बहुत दूर निकल चुकी थी और पहले से यह बात मालूम नहीं थी, वरना फौरन नंबर नोट कर लेता।” कुंवर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

इतने में नौकर चाय लेकर आ गया।

“अच्छा आइए कुंवर साहब….चाय पी ली जाये।” माथुर प्याली में चाय उड़ेलते हुए बोले।

“हमीद की इस लिखावट पर क्या कार्रवाई कीजियेगा।” कुंवर ने चाय का घूंट लेते हुए कहा।

“मुझे यह लिखावट फर्जी मालूम होती है।” माथुर ने कहा।

“बहरहाल आप जैसा ठीक समझिये। लेकिन नवाब साहब के उस कागज के बारे में क्या होगा, जिसे फ़रीदी ने जबरदस्ती लिखवाया है और जिस पर आपके भी दस्तखत हैं।”

“हाँ या मामला कानूनी तौर पर ज़रा अहम है। बहरहाल आज मैं इंस्पेक्टर जनरल को फोन करके सारी कहानी उनसे बयां करता हूँ। आप ज़रा तकलीफ़ करके नवाब साहब और मिस्टर तारिक से कह दीजिए कि वह मुझे दफ्तर में ज़रूर मिल लें।”

“अच्छी बात है! तो अब मुझे इजाजत दीजिये। ज़रा नवाब साहब का ख़याल रखिए। गज़ाला बेहद परेशान है।”

“हाँ मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा। ज्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है।” माथुर ने तसल्ली दी।

कुंवर साहब वहाँ से निकलकर सीधे अपने घर पहुँचे। नवाब रशीदुज्जमा और तारिक को माथुर साहब के यहाँ भेजकर वे सईदा और गजाला की बातें सुनने लगा।

“मुझे सख्त हैरत है कि फ़रीदी ने कुंवर साहब को कैसे छोड़ दिया क्योंकि कुंवर साहब उनके खिलाफ़ रहते हैं और एक बार उनको पिस्तौल का निशाना भी बनाने जा रहे थे।”

“खैर होगा। तुम लोग बातें करो, मैं खाना खाने जा रहा हूँ। बहुत भूख लग रही है।” वह खाना खाकर काफ़ीदेर तक किताब पढ़ते रहे और किताब पढ़ते-पढ़ते सो गये।

उनकी आँखें उस वक्त खुली, जब रिहाना उन्हें जगा रही थी। शाम हो चुकी थी। वे जल्दी से उठे और मुँह-हाथ धोकर बरामदे में निकाल आये, जहाँ नवाब रशीदुज्जमा और तारिक बैठे हुए बातें कर रहे थे।

“तो कहिए! माथुर साहब ने क्या कहा?” कुंवर ने सवाल किया।

“कुछ नहीं…वे उस वक्त मशगूल थे। हमीद के उस खत पर, जो तुमको मिला था,  उन्होंने एहतियाती तौर से वहाँ पुलिस तैनात कर दी है और इस सिलसिले में उन्हें ज़रूरी ऑर्डर दे दिये। आज रात को वे खुद यहाँ आयेंगे, तब तफ़सील से बातें होंगी।”

नवाब रशीदुज्जमा, तारिक और कुंवर साहब में काफ़ी देर तक उसी मामले पर बात होती रही। तब तक आने का वक्त हो चुका था। नवाब साहब और तारिक खाना खाने चले गये। कुंवर को भूख नहीं थी, इसलिए उन्होंने खाने से इंकार कर दिया और वे सईदा से इधर-उधर की बातें करने लगे।

खाना खाने के बाद भी लोग फिर आकर लॉन में बैठ गये।

“अभी तक माथुर साहब नहीं आये।” नवाब रशीदुज्ज्मा साहब बोले।

“हाँ उनसे यह ज़रूर कह दीजियेगा कि वे यहाँ भी पुलिस तैनात कर दें, क्योंकि गज़ाला बहुत डर गई है।” सईदा ने नवाब साहब से कहा।

इतने में कुछ आहट सुनाई दी। तारिक ने कहा, “लो शायद माथुर साहब आ गये।”

सबकी नज़रें उठ गई। लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था कि अचानक टॉर्च की चार-पाँच तेज रोशनी उनके चेहरे पर पड़ने लगी, जिससे सबकी आँखें चौंधिया गई। दूसरी ओर की रोशनी बुझ गई और एक आदमी का काला नकाब डाले पिस्तौल लिए हुए खड़ा था। पीछे तीन नकाबपोश और खड़े थे।

सईदा मुँह से चीख निकल गई। कुंवर साहब और नवाब साहब चिल्लाना ही चाहते थे कि उसने पिस्तौल सामने कर दी।

“मुझे राहुल डाकू कहते हैं।” नकाबपोश बोला, “लेकिन अब आप सब मुझे आपके साथ हमदर्दी है और हमदर्दी सिर्फ इसलिए हैं कि इसमें मेरा फायदा है। मैंने आपकी वह तहरीर हासिल कर ली है, जिसे फ़रीदी को लिखकर दे आए थे।” उसने नवाब की तहरीर जेब से निकालते हुए दिखाया।

नवाब साहब ने हाथ बढ़ाया।

“ठहरिये!” वह बोला, “इस तहरीर के लिए आपको सिर्फ ₹15,00,000 देने पड़ेंगे। जल्दी कीजिये।”

“लेकिन!”

“कुछ नहीं। अगर आपके पास रुपए ना हो, तो अपनी यह हीरे की अंगूठी उतार दीजिये। बहुत जल्द…मेरे पास वक्त नहीं। मैं जुबान का पक्का हूँ। अंगूठी मिलते ही यह तहरीर आपको मिल जायेगी।”

नवाब साहब ने मजबूरन अपनी अंगूठी उतार कर उसके हवाले कर दी।

“यह लीजिए अपनी तहरीर।” उसने कागज नवाब साहब की तरफ फेंका और पिस्तौल दिखाता हुआ पीछे हटने लगा। कुछ दूर पहुँचकर उसने कोई चीज उन लोगों की तरफ जमीन पर फेंकी, जिसके गिरने से सब लोगों की आँखों में धुआं भर गया और पानी बहना शुरू हुआ।

थोड़ी देर बाद जब गैस का असर खत्म हुआ तो पूरा साहब बोले, “मामला सिर से ऊपर होता जा रहा है।”

“हाँयह सब पुलिस की लापरवाही का नतीजा है।” तारिक ने कहा।

“भई मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। इस बुढ़ापे में सब मुझे ही निशाना बनाने पर तुले हुए हैं, आखिर मैंने उन लोगों का क्या बिगाड़ा है?” नवाब रशीदुज्ज्मा ने रुंधी हुई आवाज़ में कहा।

गज़ाला ख़ामोश बैठी हुई थी। उसके सोचने की ताकत जवाब दे चुकी थी। इस फ़रीदी ने, जिसके लिए उसने अपनी जान तक की परवाह नहीं की थी, कैसा बुरा बर्ताव किया है? फिर दूसरों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

“बेटी ज्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं। अब मैं नवाब साहब को यही राय दूंगा कि वह जल्द से जल्द वापस चले।” तारिक ने गज़ाला को तसल्ली दी।

अभी यह बातें हुई रही थी कि फ़रीदी हांफता हुआ आता दिखाई दिया। उसके कपड़े मिट्टी से भरे हुए थे और मुँह पर जगह-जगह खराशें पड़ी हुई थी।

कुंवर साहब फ़रीदी को देखते ही उसकी तरफ गुस्से से बढ़े। नवाब रशीदुज्ज्मा और तारिक भी खड़े हो गये।

“ठहरिये!” फ़रीदी बोला, “आप लोगों को बहुत ज़बरदस्त धोखा दिया गया है।”

“धोखा..बेईमान कहीं का।” कुंवर ने बढ़कर फ़रीदी का कॉलर पकड़ा।

“मैं कहता हूँ ख़ुदा के लिए मेरी बात सुन लीजिये। सिर्फ दो मिनट के लिए, वरना दुश्मन हाथ से निकल जायेगा। अगर मुझे आप लोगों को धोखा देना होता, तो मैं खाली हाथ ना कभी ना आता। वह ज़ाबिर था, जिसने मेरे भेष में आप लोगों को गिरफ्तार किया। वह यहाँ भी आने वाला था, आपकी तहरीर दिखाकर आपको ब्लैकमेल करेगा। मैं ख़ुदउसकी कैद में था। बड़ी मुश्किल से छुटकारा मिला। यह देखिए, मेरे हाथ जल गए हैं।” फ़रीदी ने एक ही सांस में सारी बात कह दी और उसने अपने हाथ दिखाया, जो बुरी तरह से जल गए थे।

कुंवर साहब की पकड़ ढीली हो गई और वे फ़रीदी को छोड़कर कुर्सी पर बैठ गये। नवाब रशीदुज्जमा और तारिक भी गौर से उसको देखने लगे।

“नहीं बेटा! वाकई हम लोगों को बहुत बड़ा धोखा दिया गया है। मुझे तो खुद हैरत है कि तुम क्या कर रहे हो। बस पहचान नहीं सके।”

“हाँ…और उसने चाल यह की थी कि आप लोगों को होश में लाने से पहले लैंप की रोशनी भी कम कर दी गई थी कि चेहरा साफ नज़र ना आये। अच्छा यह सब बातें बाद में होंगी। वह यहाँ आता ही होगा…इसलिए हम लोगों को तैयार हो जाना चाहिए। मैंने हमीद को माथुर साहब के बंगले पर भेज दिया है, वह आते ही होंगे।” फ़रीदी बोला।

“लेकिन अभी थोड़ी देर हुई कि चार नकाबपोश आए थे, जिसमें से एक अपने को राहुल बताता था और वह नवाब साहब को यह तहरीर देकर उनकी हीरे की अंगूठी ले गया।”

“ले गया…!” फ़रीदी ने इस तरह कहा, जैसे उसे उसका पहले से ही यकीन रहा हो।

इतने में माथुर साहब भी आ गए और नवाब रशीदुज्जमा ने राहुल की ताजा वारदात बयान करना शुरू कर दी।

“ओह फ़रीदी! अगर हमीद मुझसे सारे वाक्यात बयान न करता, तो मैं धोखे में तुम्हें ज़रूर गिरफ्तार कर लेता ।” माथुर साहब मुस्कुराते हुए बोले।

“अच्छा माथुर साहब वक्त बहुत कम है। जल्दी कीजिए, वरना दुश्मन फिर हाथ से निकल जायेगा। शायद आपने चुन्नीलाल और हर नारायण एंड संस के यहाँ पुलिस का पूरा इंतज़ाम कर दिया होगा।” फ़रीदी बोला।

“हाँ मैंने वहाँ के लिए सारे इंतज़ाम पूरे कर दिये और कल रात के हादसे की खबर मैंने फोन से इंस्पेक्टर जनरल को कर दी थी। वहाँ से बहुत सख्त ऑर्डर मिले हैं। वे परसों ख़ुद यहाँ पहुँच रहे हैं।”

“अच्छा खैर अब जल्दी करना चाहिए।” फ़रीदी ने कहा।

“लेकिन अभी तक हमीद नहीं आये।” माथुर बोले।

“आ जाएगा मैंने उसे पता बता दिया है, अब चलिए…एहतियाती तौर पर आठ-दस  कांस्टेबलों को यहाँ छोड़ दीजिए और आप लोग इत्मीनान से सोइये। पुलिस आप लोगों की हिफ़ाज़त के लिए डरने की कोई बात नहीं। फ़रीदी नवाब रशीदुज्जमा से बोला।

फ़रीदी और माथुर सिपाहियों को लेकर नवाबजादा शाकिर की लाइब्रेरी की तरफ रवाना हो गये।

वहाँ पहुँचकर फ़रीदी की हिदायत पर पुलिस ने लाइब्रेरी को अच्छी तरह से घेर लिया और ख़ुद फ़रीदी, माथुर और दो इंस्पेक्टर लाइब्रेरी के दरवाजे के सामने कुछ फासले पर छुप कर बैठ गये।

“आपकी घड़ी में क्या टाइम हुआ है।” फ़रीदी ने माथुर से पूछा।

“ग्यारह बजकर पंद्रह मिनट!”

“बस वह आता ही होगा, क्योंकि बारह बजे तक उसको यहाँ ज़रूर पहुँच जाना चाहिए।”

इतने में कोई शख्स तेजी से लाइब्रेरी की तरफ आता हुआ दिखाई दिया।

“मैं देखिए कोई आ रहा है।” एक इंस्पेक्टर ने इशारा किया।

माथुर ने पिस्तौल संभाला।

“ठहरिये!” फ़रीदी ने धीरे से कहा, “यह हमीद है।”

हमीद फ़रीदी के करीब आकर बोला, “अभी तक दोनों जगहों पर कोई वारदात नहीं हुई।”

“आयं!” फ़रीदी ने हैरत से कहा।

“जी हाँ! बहरहाल पुलिस वहाँ मौजूद है।”

“अच्छा! खैर तुम बैठ जाओ।” फ़रीदी कुछ सोचने लगा।

बैठे-बैठे जब काफ़ी देर हो गई, तो फ़रीदी ने फिर वक्त पूछा।

“अब ठीक बारह बजे हैं।” माथुर ने जवाब दिया।

फ़रीदी अफ़सोस करते हुए बोला, “अब कबूतर खाने के अंदर चलना चाहिए।”

“जो कुछ भी हो, लेकिन अब हम लोगों को अंदर चलना ही पड़ेगा क्योंकि मुझे यकीन हो रहा है कि वह कुछ भांप गया है।”

“चलिए मालूम होता है कि आप को कबूतर खाना बहुत पसंद आया है।” हमीद उठते हुए बोला।

फ़रीदी, हमीद, माथुर और वे दोनों सब इंस्पेक्टर लाइब्रेरी की तरफ गये। लाइब्रेरी में पहुँचकर फ़रीदी ने कालीन हटाया और एक छोटा सा बटन, जो जमीन में लगा हुआ था, उसको दबाया। तख्ता हट गया, जिससे अंदर का कमरा साफ दिखाई देने लगा। फ़रीदी पिस्तौल निकाले हुए धीरे से उसमें कूदा। फिर हमीद, माथुर और इंस्पेक्टर भी कमरे में कूद पड़े। अंदर बिल्कुल अंधेरा था। फ़रीदी ने टॉर्च जलाया। कमरे में कोई नहीं था। अलबत्ता बहुत सी चीजें बिखरी पड़ी थी और कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

“कमरे का दरवाजा कैसे खुला? यह तो बाहर से बंद था।” फ़रीदी बोला।

“अच्छा हमीद, तुम पिछले दरवाजे से कुछ सिपाहियों को लेकर जाओ, जिधर से मैं तुम्हारे पास आया था। ज़रा होशियार रहना।”

हमीद छत पकड़कर ऊपर चढ़ गया और फ़रीदी उस कमरे से बाहर निकला। टार्च की रोशनी में उसने देखा कि चार आदमी जमीन पर मुर्दा पड़े हुए हैं।

“देखा आपने! मुझे पहले ही से यकीन था कि वह भाग गया।” फ़रीदी माथुर से बोला।

“लेकिन इसमें भी उसकी कोई चाल ना हो!” माथुर बोला।

इतने में हमीद भी सिपाहियों को लेकर दूसरे दरवाजे से अंदर आया। तहखाने का कोना-कोना देखा गया, लेकिन वहाँ कोई ना था, सिवाय इसके कि कबूतर खाने पर उन लोगों को दो लाशें और मिली।

फ़रीदी अचानक को सोचते हुए बोला, “माथुर साहब जल्दी से एक गाड़ी का इंतज़ाम कीजिये। वह यहाँ से बचकर निकल गया, लेकिन अभी ज्यादा देर नहीं हुई। जाते हुए वह अपने उन साथियों को मार गया है।”

सब लोग जल्दी से तहखाने के बाहर निकल आए और फौरन एक सिपाही को गाड़ी लाने के लिए भेजा गया। फ़रीदी बेचैनी से टहलने लगा। उसकी आँखों में एक ख़ास किस्म की चमक पैदा हो गई थी।

“हमीद ज़रा मेरे साथ आओ!” फ़रीदी हमीद को लिए हुए तहखाने में दाखिल हुआ और बाहर के कमरे का अच्छी तरह से जायज़ा लेने लगा। वह मेज की दराज़ को खोलकर कुछ ढूंढने लगा, जिसमें कुछ बेकार कागजात के अलावा और कुछ नहीं था। फिर उसने इधर-उधर कुछ तलाश किया। लेकिन कोई ऐसी चीज ना मिली, जो उसके लिए काम आती। अलबत्ता उसने अलमारी में से कुछ खत और कुछ कागजात निकाल कर अपनी जेब में रखे और हमीद से बोला, “जल्दी चलो।”

दोनों जैसे ही बाहर निकले, वैसे ही गाड़ी आ गई। माथुर ने सिपाहियों को हुकुम दिया कि वे सारी लाशों को उठाकर कोतवाली ले जायें और कुछ सिपाही यहाँ रह जायें।

गाड़ी पर माथुर और दोनों इंस्पेक्टर और कुछ सिपाही बैठ गये।

“हमीद तुम भी बैठ जाओ।” फ़रीदी कहता हुआ ड्राइवर के बगल में बैठ गया, “अख्तर लॉज जल्दी चलो।” फ़रीदी ने ड्राइवर से कहा।

थोड़ी देर बाद गाड़ी अख्तर लॉज़ के सामने खड़ी थी। फ़रीदी कूदकर उतरा और सीधा सईदा के कमरे की तरह बढ़ा। सईदा के कमरे में रोशनी हो रही थी। फ़रीदी ने दरवाजा खटखटाया।

“कौन?” सईदा ने पूछा।

“मैं हूँ फ़रीदी!”

सईदा ने दरवाजा खोलते हुए पूछा, “कहिए खैरियत तो है?”

“हाँ सब ठीक है पहले यह बताओ कि लेप्टिन बाकिर की तुमसे कब मुलाकात हुई थी?”

“तीन दिन पहले। मगर आप इस कदर घबराकर भैया को क्यों पूछ रहे हैं।” सईदा ने सवाल किया।

“कुछ नहीं तुम परेशान ना हो। यह मैं बाद में बता दूंगा। उन्होंने तुमसे कुछ बताया थ।” फ़रीदी ने सवाल किया।

“हाँ वे कह रहे थे कि मैं एक काम से कोलकाता जाने वाला हूँ।” सईदा ने जवाब दिया।

“हूं..और कुछ कह रहे थे।”

“नहीं?”

“अच्छा अब मैं जा रहा हूँ। वक्त बिलकुल नहीं है। फिर सारी कहानी बताऊंगा। नवाब साहब वगैरह से कह देना कि ज़ाबिर बचकर निकल गया। हम लोग उसका पीछा करने जा रहे हैं।” फ़रीदी यह कहता हुआ तेजी से निकला और गाड़ी में आकर बैठ गया।”

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