चैप्टर 10 नारी सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 10 Nari Siyaramsharan Gupt Novel

चैप्टर 10 नारी सियारामशरण गुप्त का उपन्यास | Chapter 10 Nari Siyaramsharan Gupt Novel

Chapter 10 Nari Siyaramsharan Gupt Novel

Chapter 10 Nari Siyaramsharan Gupt Novel

हल्ली ने माँ में कुछ विचित्र परिवर्तन देखा । वह एकदम गुमसुम हो गई थी। उसने कारण पूछा तो झिड़क दिया गया। पड़ोस की कुछ स्त्रियाँ भारी मुँह किये उसके यहाँ आई थीं। माँ ने उनके साथ रूखा व्यवहार किया, यह भी वह देख चुका था । वे स्त्रियाँ उसकी माँ की कुछ बुराई- सी करती हुई लौटीं। वह चक्कर में था कि बात क्या है। इस सबका कारण उसे बाहर से मालूम हुआ ! वहाँ यह समाचार फैलते विलम्ब न लगा था कि जमना के यहाँ शहर का एक आदमी आकर वृन्दवन के मर जाने की पक्की बात कह गया है।

हल्ली ने अपने होश से बाप को कभी देखा नहीं है। फिर भी वह अत्यन्त कातर हो उठा। उसकी इच्छा हुई कि आँगन में लोट लोटकर वह अपने दुःख से उस भूमि के कण-कण को हिला दे। परन्तु इस दुःख में उसकी माँ ही जैसे उसे अपने विरुद्ध दिखाई दी। उन्होंने उसके बाप के मरने का कोई शोक नहीं किया। गुमसुम रहने से क्या होता है। ऐसे में तो खूब जोर-जोर से रोया जाता है। ऐसा न करने के लिए मुहल्ले में अपनी माँ की बुराई वह अपने कानों सुन आया है। उसने माँ के पास जाकर – ” अप्पा’ – इतना ही कह पाया कि जमना ने डाटकर टोक दिया) जा, हट यहाँ से। ऐसी बातों पर ध्यान क्यों देता है? – जमना को यह मालूम न था कि हल्ली ने अपने बाप के मरने की खबर सुनी है ।

हल्ली को भय हुआ, माँ पागल तो नहीं हो गई। कल रात से ही कुछ ऐसी बात है। आज सबेरे जब थाली में सबका सब कलेवा वैसा ही छोड़कर वह उठ खड़ा हुआ तब भी माँ ने कुछ नहीं कहा और दोपहर को पानी का लोटा भरते समय उससे मिट्टी का घड़ा फूट गया तब भी उनके लिए जैसे कोई बात नहीं हुई। ऐसे कुसमय में माँ का पागल हो जाना भी उसे उनका एक अपराध – सा ही दिखाई दिया।

उदास मन से वह वहाँ जा पहुँचा जहाँ लड़के खेल रहे थे। एक लड़के ने कहा- हमें छूना मत, नहीं तो नहाना पड़ेगा।

हल्ली ने कुपित होकर उत्तर दिया- यहाँ सड़क पर खड़े हैं। देखें कौन मना करता है। सड़क किसी के बाप की नहीं है।

राधे उसका मित्र था, वह पास आ गया। मित्रता के अधिकार से उसने कहा- तुम्हारी माँ बहुत खराब हैं।

“उन्होंने किसी की क्या चोरी की है?”

“तुम्हारे बप्पा के मर जाने पर वे रोई नहीं हैं। मेरे बाप के मरने पर मेरी माँ तीन दिन रात लगातार रोई थीं। रोटी तक नहीं खाई थी। जो देखता था वही धन्य-धन्य करके बड़ाई करता था। दो दिन पहले ही आठ आने की रंगीन चूड़ियाँ पहनी थीं, रंज के मारे उन्हें तक फोड़ डाला। “

हल्ली को ध्यान आया, यह ठीक कह रहा है। चूड़ियों के रंगीन टुकड़े उसने भी उठाकर देखे थे। पास की स्त्रियों के मना करने पर उन्हें वहीं फेंककर उसे भाग आना पड़ा था।

उसे चुप देखकर राधे ने फिर कहा- तुम अपनी माँ को सूतक मनाने के लिए समझा दो। उन्होंने बहुत बदनामी का काम किया है।

हल्ली को क्रोध आ गया। “माँ की निन्दा करता है”- कहकर उसने उसके गाल पर तड़ाक से एक चाँटा जड़ दिया और वहाँ से भाग आया ।

घर पहुँचने पर एक ओर चुपचाप बैठकर वह रोने लगा। जमना किसी काम से उधर जा रही थी, उसने कठोर पड़कर पूछा- रोता क्यों है ?

अब तक वह दबा दबा रो रहा था, अब जोर से रो पड़ा। उसने कुछ कहना भी चाहा, परन्तु ‘बप्पा- बप्पा’ शब्द को छोड़कर और कुछ स्पष्ट न हुआ ।

“मैं क्या करूँ, बैठ कर रो !” – कहती हुई जमना वहाँ से चली गई। इस बार उसका स्वर पहले सा कठोर न था ।

थोड़ी देर बाद अजीत पहुँचा, तब भी हल्ली वहीं बैठा था। वह चुप हो गया था, परन्तु रोने के चिह्न उसके मुँह पर से मिटे न थे।

अजीत ने प्यार से पूछा – रोता क्यों है बेटा ?

वह चुपचाप जहाँ का तहाँ बैठा रहा। धीरे-धीरे उसके सिर पर हाथ फेरकर अजीत बोला- तुम किस बात का रंज करते हो? लड़के हो, सुचित्ते होकर खेलो और पढ़ो।

हल्ली ने कहा- दिबिया की काकी कहती थी-बुरी बात कहती थी। लड़के कहते हैं, तुम हमें छुओ मत, तुम्हारा बाप मर गया है ! माँ को सूतक मनाना चाहिए।

अजीत ने कहा- दुत् रे पगले !

हल्ली बोला – बप्पा दूर परदेश में अकेले मर गये, न जाने कैसी तकलीफ उन्हें उठानी पड़ी। उनके लिए न माँ ने आँसू गिराये और न मैं रोया, उनका जीव क्या कहता होगा।

उसके रुके हुए आँसू फिर उसकी आँखों में दिखाई देने लगे ।

अजीत को वृन्दावन के लिए कोई दुःख न था, परन्तु हल्ली के आँसुओं ने उसे हिला दिया। इस छोटे बालक का छोटा हृदय न जाने कितनी दूरी पार करके अपने बाप से मिल गया है, – अजीत को यह इसकी निरी मूर्खता ही नहीं जान पड़ी। उसके आँसू पोंछकर उसने पूछा- तुझसे कहा किसने है कि वे मर गये, जमना ने ?

सिर हिलाकर हल्ली ने कहा- उनसे पूछने गया तो उन्होंने बीच में ही दुतकार दिया।

“फिर झूठमूठ के लिए तू क्यों रोता है? तेरे बप्पा मरे नहीं है। उस दिन तू सुना रहा था कि तेरी माँ कहती हैं- वे एक दिन यहाँ आयँगे जरूर, देर चाहे जितनी हो जाय, उनकी बात झूठ नहीं हो सकती। कहा था? तब तू झूठी फिकिर क्यों करता है? रो मत बेटा ।”

“एक आदमी आकर खबर दे गया है, वह झूठ क्यों कहेगा?”

जगराम को दो-चार गालियाँ सुनाकर अजीत ने हल्ली को विश्वास दिला दिया कि उसकी बात झूठ है। लड़के को प्रसन्न करने के लिए अपनी धारणा के विरुद्ध बोलकर भी उसे सन्तोष ही हुआ ।

हल्ली को बाप के न मरने के समाचार से भी अधिक प्रसन्नता यह हुई कि माँ की वह बदनामी झूठी थी। उसकी माँ अच्छाई में किससे कम है? जब उसका बाप मरेगा, उसने कल्पना करके सोचा, तब वे दिखा देंगी कि रंज करने में राधे की माँ भी उनके सामने कुछ नहीं !

“माँ से कह आऊँ”- कहकर वह झट से भीतर दौड़ गया।

क्रमश:

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