चैप्टर 10 : कुएँ का राज़ ~ इब्ने सफ़ी का नावेल हिंदी में | Chapter 10 Kuen Ka Raaz Ibne Safi Novel In Hindi

Chapter 10 Kuen Ka Raaz Novel In Hindi

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Chapter 10 Kuen Ka Raaz Novel In Hindi

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और वह कुआँ

दूसरे दिन नवाब साहब की कोठी में कोहराम मचा हुआ था. नवाब साहब अभी तक नहीं लौटे थे. सबसे ज्यादा परेशान और ख़ामोश फ़रीदी था. गहरी सोच की वजह से उसके माथे पर धारियाँ उभरी हुई थीं.

“जवाब…!’ तारिक़ ने उसके कमरे में दाखिल होते ही कहा, “छत से मेरा नेवला गायब है.”

“अरे जनाब, यहाँ आदमी ग़ायब हुए जा रहे हैं और आपको अपने नेवले की फ़िक्र पड़ी है.”

“आप ग़लत समझे मिस्टर फ़रीदी.” तारिक़ बोला, “नवाब साहब की वजह से मुझे ख़ुद भी परेशानी है….मगर वह नेवला….”

“बहुत कीमती था.” फ़रीदी ने उसका जुमला पूरा कर दिया.

“जी हाँ….”

“अरे साहब, जानवर है…कहीं भाग-वाग गया होगा.” फ़रीदी ने कहा.

“भाग तो वह सकता ही नहीं….ज़रूर उसे किसी ने पकड़ लिया.”

“कहिये, हिन्दुस्तान आपको पसंद आया.” फ़रीदी अचानक पूछ बैठा.

तारिक़ चौंककर उसे घूरने लगा.

“जी हाँ…क्यों नहीं…मगर मेरा नेवला.”

“छोड़िये भी, मिल जायेगा…आप इससे पहले भी कभी हिंदुस्तान आये थे.”

“जी नहीं…लेकिन नेवला.”

“मेरा ख़याल से नेवला सिर्फ़ इसलिए ग़ायब किया गया है कि कहीं वह नवाब साहब को ढूंढ न निकाले.” फ़रीदी ने कहा.

“मैं आपका मतलब नहीं समझा.”

“मतलब समझ कर क्या कीजिएगा….बहरहाल, मैं वादा करता हूँ कि आपका कीमती नेवला ढूंढने की कोशिश करूंगा.”

“शुक्रिया…शुक्रिया….” तारिक़ ने कहा. माफ़ कीजिएगा मैंने रुकावट डाली…”मगर मैं क्या करूं…मेरा नेवला.”

“आप इत्मिनान रखिए….जाकर नाश्ता कीजिए….सब ठीक हो जायेगा. फ़रीदी ने कहा.

तारिक़ चला गया.

कुछ देर बाद गज़ाला आ गयी.

“मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं.” वह कुर्सी पर बैठते हुए बोली.

“घबराइए नहीं…सब ठीक हो जायेगा.” फ़रीदी ने कहा, “जब तक कि यह मामला साफ़ नहीं हो जाता, मैं यहीं ठहरा रहूंगा.”

“किस मुँह से आपका शुक्रिया अदा करूं.”

“किसी मुँह से नहीं.” फ़रीदी ने कहा, “आखिर आप इतनी उदास क्यों हैं? मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि नवाब साहब जहाँ कहीं भी हैं. खैरियत से हैं.”

“ख़ुदा करे, ऐसा ही हो.”

“इंशा अल्लाह…ऐसा ही होगा.” फ़रीदी ने कहा, “आपने नाश्ता किया या नहीं.”

“अरे…ऐसे में नाश्ते की किसे सूझती है.”

“फिर वही बात. मैं कहता हूँ, आखिर इससे फ़ायदा ही क्या है.”

“अब मैं अपने दिल को क्या करूं.”

“संभालिए….आप पढ़ी-लिखी और समझदार हैं.”

“कोशिश तो करती हूँ.”

“अच्छा जाइए…नाश्ता कर डालिए.”

“और आप…”

“मैं अभी नहीं करूंगा….ज़रूरी तौर पर ऐसा कह रहा हूँ.”

ग़ज़ाला चली गयी.

फ़रीदी की आदत थी कि जब उसे किसी अहम् मामले पर गौर करना होता था, तो वह आम तौर पर खाली पेट ही रहा करता था…इसलिए आज भी उसने अभी तक नाश्ता नहीं किया था…वह ख़ुद पर हमला होने के बाद से अब तक बैठा हुआ सोच रहा था.

थोड़ी देर बाद वह अपने कमरे से निकलकर हमीद के कमरे की तरफ़ गया. हमीद शायद अभी-अभी सो कर उठा था…उसके बाल उलझे हुए थे और आँखें सूजी हुई थीं.

“तुम जैसा सोने वाला भी आज तक मेरे नज़रों से नहीं गुजरा.” फ़रीदी ने कहा.

“आपकी नज़रों में अभी गुजरा ही क्या है.” हामीद ने कहा, “नवाब साहब मिले या नहीं?”

“अभी तक कुछ पता नहीं चल सका.”

“तो यक़ीनन मेरा शक सही है.” हमीद ने कहा.

“ओह, आप भी शक करने लगे हैं. ज़रा मुझे भी बताइए, शायद आप ही सही रास्ते पर हों.”

“नवाब रशीदुज्ज़माँ ख़ुद ही मुज़रिम हैं.” हमीद ने कहा.

“वह कैसे…” फ़रीदी एक आराम-कुर्सी पर बैठता हुआ बोला.

“यह मैं नहीं जानता…मेरे पास इसका बहुत ही मामूली सबूत है और वह यह कि नवाब रशीदुज्ज़माँ आप पर हमले के बाद ही क्यों ग़ायब हो गये. आपने हमला करने वाले से दो-दो हाथ भी किये थे. हो सकता है, नवाब साहब को ख़याल आया हो कि कहीं आपने हमला करने वाले को पहचान न लिया हो.”

“बहुत अच्छे! लेकिन यह तो सोचो कि आखिर उनके ग़ायब होने की क्या वजह हो सकती है. ज़ाहिर है कि हमलावर बच कर निकल गया था और फिर मैं इसका सबूत किस तरह पहुँचाता कि इसमें रशीदुज्ज़माँ ही का हाथ है.”

“हर शख्स इतना नहीं सोच सकता था कितना कि आप सोचते हैं.” हमीद ने कहा.

“खैर, बहरहाल…ज़रा अपनी कुर्सी क़रीब ले आओ.” फ़रीदी ने कहा.

“खैरियत, कोई ख़ास बात.” हमीद ने मुस्कुराते हुए कहा. उसने अपनी कुर्सी फ़रीदी के करीब कर दी.

“सुनो…” फ़रीदी धीरे से बोला, “आज रात मैं उस कुएँ में उतरूंगा.”

“मैं आपको हरगिज़ न उतरने दूंगा.”

“क्यों….?”

“मैं मुनासिब नहीं समझता.”

“नहीं भई….अब उसके बगैर काम नहीं चल सकता.”

“तो आप पर हुस्न का जादू बुरी तरह चल गया है.”

“क्या मतलब…?”

“मैं आपसे सच कहता हूँ कि ग़ज़ाला दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत लड़की है.”

“फिर वही गधेपन की बातें.”

“यह कोई नई बात नहीं…मैंने शायद अपनी ज़िन्दगी में कभी घोड़ेपन की  बातें नहीं की.”

“हटाओ भी…यह बेकार की बातें…तफ़रीह के लिए फिर बहुत वक़्त मिलता रहेगा.”

“हमीद ख़ामोश हो गया.”

“मेरा ख़याल है कि रात को उस कुएँ की निगरनी ज़रूर की जाती होगी.”

“निगरानी…निगरानी कौन करता होगा?”

“मुज़रिम….”

“मुज़रिम तो ग़ायब है.”

“फ़िलहाल, यही मान लो कि नवाब रशीदुज्जमाँ मुज़रिम नहीं है.” फ़रीदी ने कहा.

“बहरहाल…हाँ, तो आप क्या कहना चाहते हैं.” हमीद ने कहा.

“तुम शाम ही से बाग़ पर नज़र रखना.”

“बेहतर है…लेकिन मैं किसी तरह यह मुनासिब नहीं समझता कि आप कुएँ में उतरें.”

“बस, देखते रहो….मेरे लिए किसी तरह का खतरा नहीं.”

उसी दिन रात को हमीद दौड़ता हुआ फ़रीदी के पास आया.

“आपका खयाल सही था.” वह हाँफता हुआ बोला, “मैंने अभी-अभी एक आदमी को कुएँ की पीछे वाली झाड़ी में छिपते हुये देखा है.”

फ़रीदी पहले ही से तैयार बैठा था. उसने ज़रूरी सामान साथ लिया और हमीद के साथ चला गया.

गेट के बाहर निकलकर दोनों चहार-दीवारियों के नीचे चलने लगे. एक जगह फ़रीदी रुक गया.

“मेरा ख़याल है कि यही वह जगह हो सकती है, जहाँ वह छिपा होगा….” फ़रीदी ने धीरे से हमीद ने कान में कहा.

हमीद ने सिर हिलाया और देखते-ही-देखते फ़रीदी दीवार पर चढ़ गया. ऊपर से उसने हमीद को भी चढ़ जाने का इशारा किया.

दोनों धीरे से दूसरी तरफ़ उतरने लगे.

“वह देखिए, कुएँ की जगत के पास झाड़ियों में.” हमीद ने धीरे से कहा,

फ़रीदी ने सिर हिलाया. वहाँ कोई छिपा हुआ था. फ़रीदी अपनी पिस्तौल की नाल पकड़ कर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा. झाड़ियों के करीब पहुँचकर उसका पिस्तौल वाला हाथ ऊपर उठा और साथ ही किसी के गिरने की आवाज़ आयी.

“हमीद…हमीद…जल्दी करो….रस्सी.” फ़रीदी ने कहा.

वह एक लंबे-चौड़े आदमी को दबोचे बैठा था. आदमी सिर में चोट लगने की वजह से बेहोश हो चुका था. दोनों ने मिलकर उसे एक पेड़ के तने से जकड़ दिया.

“तुम्हारा पिस्तौल भरा हुआ है न….” फ़रीदी ने पूछा.

हमीद ने हाँ में सिर हिलाया.

“देखो, इसकी अच्छी तरह निगरानी करते रहना. अगर कोई बात तो, तो पिस्तौल इस्तेमाल करना.”

यह कहकर फ़रीदी झाड़ियों में घुस गया. कुछ पलों के बाद जब वह वहाँ से निकला, तो उसके हाथ में एक पिंजरा था.

“यह क्या….?” हमीद ने धीरे से पूछा.

“तारिक़ का नेवला.”

“अरे…”

“इसमें ताज्जुब की क्या बात है.”

“तो इसे आप ही ने ग़ायब किया था.”

“हाँ…इस कुएँ में साँप बहुत हैं. लेकिन वे नेवले की बू पाते ही अपने बिलों में जा छिपेंगे.”

“ओह…समझा…”

फ़रीदी ने पिंजरा जमीन पर रख दिया और रेशम की एक मजबूत डोरी के सिरे में एक पत्थर बांध कर उसे कुएँ में फेंक दिया और डोर का दूसरा सिरा क़रीब के एक पेड़ के तने से बांध कर माथे से पसीना पोंछने लगा.

“अच्छा भई हमीद…ख़ुदा हाफ़िज़…मैं चला…बहुत होशियारी से रहना…अगर कोई खतरा महसूस हो, तो बेख़ौफ़ गोली चला देना…” फ़रीदी ने कहा और नेवले का पिंजरा अपने पास लिपटी हुई चमड़े की पेटी में लटका लिया. फिर टॉर्च की रोशनी में देर तक कुएँ के अंदर देखता रहा. अच्छी तरह इत्मिनान कर लेने एक बाद उसने टॉर्च पतलून की जेब में डाली और रेशम की डोर के सहारे कुएँ में उतरने लगा. रेशम की डोर के सहारे उतरना कोई आसान काम न था. थोड़ी दूर जाकर डोर पसीने की वजह से फिसलने लगी.

कुएँ में बहुत अंधेरा था. उसे अपने आस-पास साँपों की फुफकारें सुनाई दे रही थीं.

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