चैप्टर 10 हृदयहारिणी किशोरी लाल गोस्वामी का उपन्यास | Chapter 10 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

चैप्टर 10 हृदयहारिणी किशोरी लाल गोस्वामी का उपन्यास | Chapter 10 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

Chapter 10 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

Chapter 10 Hridayaharini Kishorilal Goswami Ka Upanyas

दसवां परिच्छेद : गृहप्रवेश

“रत्नाकरे युज्यत एव रत्नम्।”

निदान, बीरेन्द्र कुसुम का हाथ पकड़, संगमर्मर की निसीढ़ियों को तय करते हुए जब अंतःपुर की दूसरी ड्योढ़ी पर पहुंचे तो वहां पर सजी हुई तीन सौ स्त्रीसेना ने अपनी अपनी तल्वारें झुकाकर बीरेन्द्र और कुसुम की अभ्यर्थना की और कुसुम की बराबरवाली एक राजनंदिनी ने आगे बढ़कर बीरेन्द्र को यथोचित अभिवादन किया और कुसुम को स्नेह से गले लगा लिया। फिर बीरेन्द्र कुसुम को लिये हुए अन्तःपुर के एक विशाल सीसमहल में पहुंचे, जो बहुत ही सुहावना और बहुमूल्य वस्तओं से भली भांति सजा हुआ था। वह गृह कांच के असवाबों के अलावे सोने चांदी और जड़ाऊ खिलौंनो तथा गुलदस्तों से भली भांति सजा हुआथा और दलदार मखमली गद्दा, जिसमें ज़रदोज़ी का काम किया हुआथा, कमरे में बिछा था। उस कमरे के बीचोबीच एक सोने का जड़ाऊ सिंहासन बिछा हुआ था, जिसपर जर्दोजी काम के गद्दी-तकिए रक्खे हुए थे और जड़ाऊ चौडंडियों में मोतियों की झालरवाला चन्द्रातप लगा हुआ था। बीरेन्द्र ने उसी सिंहासन पर बलपूर्वक कुसुम को ले जाकर बैठा दिया और अपनी अंगूठी उतार, उस की अंगुली में पहिनाकर मुस्कुराते हुए कहा,-“

“राजनन्दिनी! यह मेरी तुच्छ भेंट ग्रहण कीजिए। (लवंग की ओर दिखलाकर) यह राजा नरेन्द्रसिंह को छोटी बहिन हैं, इनका नाम कुमारी लवंगलता है। मैं अब आपसे बिदा होता हूं और फिर भी यही प्रार्थना करता जाता हूं कि आप मुझे कभी अपने जी से भुला न दीजिएगा। थोड़ी ही देर में आप महाराज नरेन्द्रसिंह को देखेंगी, जिनके साथ आपका बिवाह होनेवाला है और जिसके होने से मेरे आनन्द की सीमा न रहेगी।”

कुसुम से यों कह बीरेन्द्र ने एक भेद से भरी हुई आंख लवंग-लता पर डाली और बिचारी कुसुम को घबड़ाहट, उद्वेग, चिंता, संदेह, संशय आदि के जंजाल में तड़पती हुई छोड़कर वे उस कमरे से बाहर चले गए।

बीरेन्द्र के जाने पर पहिले लवंगलता बोली,-“आप घबरायं नहीं, मेरे भैया अभी आपसे मिलेंगे।”

किन्तु इस बात का जवाब कुसुम ने कुछ भी न दिया, कदाचित उसने लवंगलता की वह बात सुनी भी न हो तो कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि बीरेन्द्र की बातों ने उस समय उसके चित्तको इतना डामा-डोल करदिया था कि जिससे वह अपने आप में ही न थी। वह न रोती थी,न हंसती थी, न उसाँसें लेती थी, न लवंगलता की बातें सुनती थी, न कुछ आप ही कहती थी और न इसी बात का उसे कुछ ध्यान था कि,-‘मैं कौन हूं, किसलिये यहां लाई गई हूं, मेरे पास कौन खड़ा है और मेरे साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है!’

निदान, कुसुम को उस अवस्था में आध घंटे से ज्यादे न रहना पड़ा, क्योंकि उसी कमरे में, जिस कमरे में कि वह बल-पूर्वक जड़ाऊ सिंहासन पर बैठाई गई थी और उसके पास लवंगलता खड़ी थी, चालीस आदमियों के साथ बीरेन्द्र आ पहुंचे। उन पर आंख पड़ते ही कुसुम चिहुंक उठी, किन्तु बिना कुछ कहे-सुने, चुपचाप, कठपुतली की नाईं नीची नार किए, वह जहांकी तहां बैठी रही। बीरेन्द्र के साथ जो चालीस आदमी उस कमरे में आए थे, उनमें महाराज नरेन्द्रसिंह के मित्र मदनमोहन, राजमंत्री माधवसिंह, कुलपुरोहित, कोषाध्यक्ष, सेनापति आदि राज्य के प्रधान प्रधान कर्मचारी और माननीय लोग थे।

इतने ही में बीस स्त्रियां कमरे में आकर कुसुम के पीछे खड़ी हो गईं, जिनके हाथों में छत्र,चमर,पंखे और नंगी तलवारें थीं। कुसुम के सिंहासन के बाईं ओर राजनंदिनी लवंगलता, सिंहासन का पाया पकड़े हुई स्वाभाविक लज्जा और संकोच से संकुची हुई खड़ी थी।

उस समय बीरेन्द्र ने, कुसुम के सिंहासन के दाहिनी ओर खड़े हो, उन व्यक्तियों से, जो कुसुम के सिंहासन के आगे कुछ दूर पर खड़े मर्यादा से सिर झुकाए हुए थे, कहा,-

“माननीय महाशयों! कृष्णनगर के स्वर्गीय महाराज धनेश्वरसिंह महोदय की कन्या, जो आप लोगों के मित्र राजा नरेन्द्रसिंह की पटरानी बनाने के लिये यहाँ लाई गई हैं, आप लोगों के सामने सिंहासन पर विराजमान हैं।”

बीरेन्द्र की बात सुनकर पहिले पुरोहितजी ने सिंहासन के पास पहुंच, सोने के नारियल को कुसुम की गोद में देकर आशीर्वाद दिया कि,-“श्रीमती चिरसौभाग्यवती और बीरमाता हों।”

फिर राजमंत्री माधवसिंह, मदनमोहन आदि उपस्थित व्यक्तियों ने कुसुम को भेंट दी और तब सब लोग सिर नवाकर कमरे में से चले गए।

इसके बाद बीरेन्द्र का इशारा पाकर सब स्त्रियां भी कुसुम को भेंट दे-दे-कर कमरे से बाहर होगई और वहाँ पर बीरेन्द्र, कुसुम और लवंगलता के अलावे और कोई न रह गया।

उस समय औसर देखकर लवंगलता ने कहा,-” ऐं! भैया! भाभी तो बड़ी सुन्दर हैं! आप कहांसे ऐसी सुन्दर बहू लाए! इनका पाना तो बड़ी भारी तपस्या का फल कहा जा सकता है!”

बीरेन्द्र ने मुस्कुराकर कहा,-“अरी, जा, पगली! तैने तो सारा भंडा ही फोड़ दिया।”

इतना सुनते ही कुसुम ने, जो अब तक बध्य-पशु की भांति एक प्रकार से सिंहासन-रूपी खंभे में बंधी हुई सी थी और इतना समय जिसने सपने की भांति बड़ी कठिनाई से काटा था, भौहें तानकर बीरेन्द्र की ओर देखा और ताने के तौरपर कहा,-

“क्यों, महात्मा! अभीतक उन देवता के तो दर्शन हुए ही नहीं, जिन्हें बलि चढ़ाने के लिये मैं यहां लाई गई हूं!”

बीरेन्द्र ने नेहभरे नैनों से उसकी ओर निहारते हुए कहा,- “प्यारी, कुसुम! तुम्हारा अचल अनुराग मुझपर जानकर उदार-हृदय नरेन्द्र सिंह ने तुम्हें मुझीको देडाला!”

यों कहकर उन्होंने कुसुम का हाथ पकड़ना चाहा, पर उसने उनका हाथ झटक दिया और तिरछी होकर कहा,-“वाह! भला, मैं तुम्हें कब चाहती थी! मैं तो महाराज नरेद्रसिंह की ही दासी बनूंगी, न कि त्रैलोक्य में किसी और की!”

पाठकों को समझना चाहिए कि लवंगलता का इशारा पाकर बीरेन्द्र के सारे प्रपंचों को अब कुसुम भलीभांति समझ गई थी, इसीलिये उसने इस समय ऐसा उत्तर दिया और यों कहकर वह सिंहासन से नीचे उतर और बीरेद्र के सामने खड़ी हो, हाथ जोड कर कहने लगी,-

“चतुरचूड़ामणि! बस, अब आप अपनी चतुराई रहने दीजिए। अब आपकी माया मुझपर न चलेगी! हाय रे निर्दई, कपटी! तुझे जरा दया तो दूर रहे, लाज भी न आई कि जो तूने मेरे नन्हें से कलेजे पर कैसी कैसी चोटें पहुंचाईं! किन्तु हा!-निगोड़े हिये की जलन से मैं न जाने क्या क्या कह गई! इसलिये प्राणनाथ! दासी का अपराध क्षमा करना।”

यों कहकर वह बीरेन्द्र के चरणों पर गिरा ही चाहती थी कि उन्होंने उसे रोक लिया और कहा,-“प्यारी, कुसुम! मेरा दुष्टपन अपने मन से अब दूर कर दो। सचमुच बीरेन्द्र और नरेन्द्र कोई दो व्यक्ति नहीं हैं; किन्तु इस ढंग का परिहास मैं इसीलिये तुम्हारे साथ अब तक करता रहा कि इस परिहास से जितना तुम्हें दुःख होता था, उससे कड़ोर गुना अधिक मुझे सुख मिलता था। अस्तु, जाने दो; मेरी हृदयेश्वरी, हृदयहारिणी, प्यारी! तुम नरेन्द्र को छोड़कर संसार में और किसीकी भी मानसरंजिनी नहीं होसकती!”

पाठकों ने तो कदाचित लिखावट के ढंग से कुसुम के समझने के पहिले ही यह बात जान ली होगी कि बीरेन्द्र और नरेन्द्र कोई दो व्यक्ति नहीं हैं; और यह बात भी कदाचित पाठक भूले न होंगे कि बीरेन्द्र ने कमलादेवी से उनके मरने के समय अपना सच्चा हाल कह दिया था और आज हमने भी पाठकों के आगे सच सच कह दिया।

निदान, उस समय उस अनिर्वचनीय सुख की तरंगें इतने बेग से कुसुम के हृदय में क्रीड़ा करने लगी कि जिनका उफान उसकी आंखों से बह निकला, जिसे नरेन्द्र ने अपने पटुके के छोर से धीरे धीरे रोका और कहा,-“प्यारी! अब क्यों व्यर्थ खेद करती हो?”

कुसुम ने रुंधे हुए गले से कहा,-“प्राणनाथ! आज मेरे सुख की सीमा नहीं है! आज मैं समझती हूं कि मेरे समान बढ़भागिन त्रिलोक में भी कोई दूसरी न होगी। अहा, प्यारे! मुझ जैसी एक अनाथिनी, सदा की दुखिया, भिखारिन को तुमने अपनी पटरानी बनाया! प्रियतम! मैं जगदीश्वर से यही बर मांगती हूं कि मैं जनम-जनम तुम्हारे ही चरणों की दासी हुआ करूं!”

इतना कहते कहते कुसुम की आंखें फिर भर आईं, पर उस समय अवसर देखकर लवंगलता ने दो एक ऐसी बातें कहीं कि जिनसे वह कली की तरह खिल गई।

इतनी देर से लवंगलता चुपचाप खड़ी थी, पर उससे अब न रहा गया और बीरेन्द्र-नहीं, नहीं, नरेन्द्र की ओर देखकर उसने कहा,-“क्यों भैया! बतलाइए, इन्हें मैं अभी क्या कहकर पुकारूं?”

नरेन्द्र,-“जो तेरे जी में आवे।”

लवंगलता,-“तो मैं ‘भाभी’ कहकर पुकारूंगी (कुसुम की ओर देखकर) क्यों भाभी! यह बात ठीक है न? या जैसा आप मुझे सिखलादें!”

इतने ही में नरेन्द्र ने धीरे से कोई गुप्त बात कुसुम के कानों में कह दी, जिसका हाल लवंगलता को कुछ भी मालूम नहीं हुआ और चट कुसुम ने उसके जवाब में यों कहा,-“अच्छा, बीबी-रानी! पहिले तुम यह तो बतलाओ कि मैं बबुआ मदनमोहन को आज ही से ‘नन्दोईजी’ कहकर पुकारना क्यों न आरंभ कर दूं? ऐ, लो! भागी क्यों? सुनो, सुनो!!!”

पर फिर कौन सुनता कुसुम की इस बात के सुनते ही लवंगलता वहां से भाग गई थी! फिर नरेन्द्र ने उसे बुलाकर कुसुम को उसके हवाले किया और आप अन्तःपुर से बाहर चले गए।

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