चैप्टर 1 विपात्र गजानन माधव मुक्तिबोध का उपन्यास | Chapter 1 Vipatra Gajanan Madhav Muktibodh Ka Upanyas Novel In Hindi
Chapter 1 Vipatra Gajanan Madhav Muktibodh Ka Upanyas
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लंबे-लंबे पत्तोंवाली घनी बड़ी इलायची की झाड़ी के पास जब हम खड़े हो गए, तो पीछे से हँसी का ठहाका सुनाई दिया। हमने परवाह नहीं की, यद्यपि उस हँसी में एक हल्का उपहास भी था। हम बड़ी इलायची के सफेद-पीले, कुछ लंबे पंखुरियोंवाले फूलों को मुग्ध हो कर देखते रहे। मैंने एक पंखुरी तोड़ी और मुँह में डाल ली। उसमें बड़ी इलायची का स्वाद था। मैं खुश हो गया। बड़ी इलायची की झाड़ी की पाँत में हींग की घनी-हरी झाड़ी भी थी और उसके आगे, उसी पाँत में, पारिजात खिल रहा था। मेरा साथी, बड़ी ही गंभीरता से प्रत्येक पेड़ के बौटे निकाल नाम समझाता जा रहा था। लेकिन मेरा दिमाग अपनी मस्ती में कहीं और भटक रहा था।
सभी तरफ हरियाला अँधेरा और हरियाला उजाला छाया हुआ था और बीच-बीच में सुनहली चादरें बिछी हुई थीं। अजीब लहरें मेरे मन में दौड़ रही थीं।
मैं अपने साथी को पीछे छोड़ते हुए, एक क्यारी पार कर, कटहल के पेड़ की छाया के नीचे आ गया और मुग्ध भाव से उसके उभरे रेशेवाले पत्तों पर हाथ फेरने लगा।
उधर कुछ लोग, सीधे-सीधे ऊँचे-उठे बूढ़े छरहरे बादाम के पेड़ के नीचे गिरे हुए कच्चे बादामों को हाथ से उठा-उठा कर टटोलते जा रहे थे। मैंने उनकी ओर देखा और मुँह फेर लिया। जेब में से दियासलाई निकाल कर बीड़ी सुलगाई, उनके बारे में सोचने ही वाला था, इतने में मुझे दूर से एक मोटे सज्जन आते दिखाई दिए। उनके हाथ में फूलों के कई गुच्छे थे – वे विलायती फूल थे, अलग डिजाइनों के, अलग रूप-रंग के, – गुजराती स्त्रियों की सादी किंतु साफ-सफेद साड़ियों की किनारियों की याद दिलाते थे। जाने क्यों मुझे लगा कि वे फूल उनके हाथों में शोभा नहीं देते, क्योंकि वे हाथ उन फूलों के योग्य नहीं हैं।
मैंने अपनी परीक्षा करनी चाही। आखिर मैं उनके बारे में ऐसा क्यों सोचता हूँ? एक खयाल तैर आया कि वे सज्जन किसी दूसरे की, किसी दूसरे बड़े की हूबहू नकल कर रहे हैं, इसलिए कि उन्होंने अपने जाने-अनजाने किसी बड़े आदमी के रास्ते पर चलना मंजूर किया है। उनके हाथ में फूल इसलिए नहीं हैं कि उन्हें वे प्यारे हैं, बल्कि इसलिए कि उनका आराध्य व्यक्ति बागवानी का शौकीन है और दूर अहाते के पास कहीं वह खुद भी फूलों को डंठलों-सहित चुन रहा है।
वे सज्जन मेरे पास आ जाते हैं। मुझे फूलों का एक गुच्छा देते हैं, कहते हैं, ‘कितना खूबसूरत है।’
मैं उनके चेहरे की तरफ देखता रह जाता हूँ। तानपूरे पर गानेवाली किसी नौजवान शास्त्रीय संगीतकार की मुझे याद आ जाती है। हाँ, वैसा ही उसका रियाज है। लेकिन, काहे का? आराध्य की उपासना का!
अपने खयाल पर मैं मुस्करा उठता हूँ और उनके कंधे पर हाथ रख कर कहता हूँ, ‘यार, इन फूलों में मजा नहीं आता। एक कप चाय पिलवाओ।’
चाय की बात सुन कर वे ठठा कर हँस पड़ते हैं। बहुत सरगरमी से, और प्यार भर कर वे अपने सफेद-झक कुरते में से एक रुपए का नोट निकाल कर मुझे दे देते हैं, ‘जाइए सिंग साहब के साथ। पी आइए।’
मैं खुशी से उछल पड़ता हूँ। वे आगे बढ़ जाते हैं। मैं पीछे से चिल्ला कर कहता हूँ, ‘राव साहब की जय हो!’
मैं सोचता हूँ कि मेरी आवाज बगीचे में दूर-दूर तक जाएगी। लेकिन लोग अपने में डूबे हुए थे। सिर्फ सिंग साहब हींग की झाड़ी का एक पत्ता मुझे ला कर दे रहा था।
मैंने कहा, ‘सिंग साहब, तुम्हारा हेमिंग्वे मर गया!’
वह स्तब्ध हो गया। वह कुछ नहीं कह सका। उसने सिर्फ इतना ही पूछा, ‘कहाँ पढ़ा? कब मरा?
मैंने उसे हेमिंग्वे की मृत्यु की पूरी परिस्थिति समझाई। समझाते-समझाते मुझे भी दु:ख होने लगा। मैंने कहा, ‘यह जान-बूझ कर उसने किया।’
जगतसिंह ने, जिसे हम सिंग साहब कहते थे, पूछा, ‘बंदूक उसने खुद अपने आप पर चला ली?’
मैंने कहा, ‘नहीं, वह चल गई और फट पड़ी। मृत्यु आकस्मिक हुई।’
जगतसिंह ने कहा, ‘अजीब बात है।’
मैं आगे चलने लगा। मेरे मुँह से बात झरने लगी – हेमिंग्वे कई दिनों से चुप और उदास था, संभव है, अपनी आत्महत्या के बारे में सोचता रहा हो, यद्यपि उसकी मृत्यु हुई आकस्मिक कारणों से ही।
मेर सामने एक लेखक-कलाकार की संवेदनाओं के, उसके जीवन के स्वकल्पित चित्र तैरते जा रहे थे। इतने में मैंने देखा कि बगीचे के अहाते के पश्चिमी छोर पर खड़े हुए टूटे फव्वारे के पास वाली क्यारी के पास से राव साहब गुजर रहे हैं। उनकी सफेद धोती शरद के आतप में झलमला रही है… कि इतने में वहाँ से घबराई हुई लेकिन संयमित आवाज आती है, ‘साँप, साँप!’
मैं और जगतसिंह ठिठक जाते हैं। मुझे लगता है कि जैसे अपशकुन हुआ हो। सब लोग एक उत्तेजना में उधर निकल पड़ते हैं। आम के पेड़ों के जमघट में खड़े एक बूढ़े युकलिप्टस के पेड़ की ओट में हाथ-भर का मोटा साँप लहराता हुआ भागा जा रहा है।
मैं स्तब्ध रह गया। क्या मस्त लहराती हुई चाल है! बिलकुल काला लेकिन साँवली पीली डिजायनोंवाला। नौजवान माली हाथ में डंडा ले कर खड़ा था। उस पर वार नहीं कर रहा था। सबने कहा, ‘मारो, मारो।’ लेकिन वह खड़ा रहा।
‘मैं नहीं मारूँगा साहब! यह यहाँ का देवता है।’
इतने में हमारे बीच खड़े हुए एक नौजवान ने उसके हाथ से डंडा छीन लिया। लेकिन तब तक वह साँप झाड़ियों में गायब हो चुका था।
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