चैप्टर 1 देवदास शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास | Chapter 1 Devdas Sharat Chandra Chattopadhyay In Hindi Read Online
Chapter 1 Devdas Sharat Chandra Chattopadhyay
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एक दिन बैसाख के दोपहर मे जबकि चिलचिलाती हुई कड़ी धूप पड़ रही थी और गर्मी की सीमा नही थी, ठीक उसी समय मुखोपाध्याय का देवदास पाठशाला केएक कमरे के कोने मे स्लेट लिये हुए पांव फैलाकर बैठा था। सहसा वह अंगड़ाई लेता हुआ अत्यंत चिंताकुल हो उठा और पल-भर मे यह स्थिर किया कि ऐसे सुहावने समय मे मैदान मे गुड्डी उड़ाने के बदले पाठशाला मे कैद रहना अत्यंत दुखदायी है। उर्वर मस्तिष्क से एक पाय भी निकल आया। वह स्लेट हाथ मे लेकर उठ खड़ा हुआ।
पाठशाला मे अभी जलपान की छुट्टी हुई थी। लड़को का दल तरह-तरह का खेल-कूद और शोरगुल करता हुआ पास के पीपल के पड़े के नीचे गुल्ली-डंडा खेलने लगा। देवदास ने एक बार उस ओर देखा।
जलपान की छुट्टी उसे नही मिलती थी; क्योकि गोविंद पंडित ने कई बार यह देखा है कि एक बार पाठशाला के बाहर जाने पर फिर लौट आना देवदास बिलकुल पसंद नही करता था उसके पिता की भी आज्ञा नही थी। अनेक कारणो से यही निश्चय हुआ था कि इस समय से वह छात्र-सरदार भूलो की देख-भाल मे रहेगा।
एक कमरे मे पंडितजी दोपहर की थकावट दूर करने के लिए आंख मूंदकर सोये थे। और छात्र सरदार भूलो एक कोने मे हाथ पांव फैलाकर एक बेच पर बैठा था और बीच-बीच मे कड़ी उपेक्षा के साथ कभी लड़को के खेल को और कभी देवदास और पार्वती को देखता जाता था। पार्वती को पंडितजी के आश्रय और निरीक्षण मे आये अभी कुल एक महीना हुआ है। पंडितजी ने संभवतः इसी थोड़े समय मे उसका खूब जी बहलाया था, इसी से एकाग्र मन से धैर्यपूर्वक सोये हुए पंडितजी का चित्र ‘बोधोदय’ के अंतिम पृष्ठ पर स्याही से खीच रही थी और दक्ष चित्रकार की भांति विविद भाव से देखती थी कि उसके बड़े यत्न का वह चित्र आदर्श से कहां तक मिलता है। अधिक मिलता हो, ऐसी बात नही थी, पर पार्वती को इसी से यथेष्ट आनंद और आत्मा-संतुष्टि मिलती थी।
इसी समय देवदास स्लेट हाथ मे लेकर उठ खड़ा हुआ और भूलो को लक्ष्य करके कहा- ‘सवाल हल नही होता।’
भूलो ने शांत और गंभीर मुख से कहा-‘कौन सा सवाल?’
‘इबारती…!’
‘स्लेट तो देखूं।’
उसके सब काम स्लेट हाथ मे लेने मात्र से हो जाते थे। देवदास उसके हाथ मे स्लेट देकर पास मे खड़ा हुआ। भूलो यह कहकर लिखने लगा कि एक मन तेल का दाम अगर चौदह रुपये, नौ आने,
तीन पाई होता है तो…?
इसी समय एक घटना घटी। हाथ-पांव से हीन बेच के ऊपर छात्र-सरदार अपनी पद-मर्यादा के उपयुक्त आसन चुनकर यथानियम आज तीन वर्ष से बैठता आता है। उसके पीछे एक चूने का ढेर लगा हुआ था। इसे किसी समय पंडितजी ने सस्ती दर से खरीदकर रखा था। सोचा था कि दिन लौटने पर इससे एक पक्का मकान बनवाएंगे। कब वह दिन लौटेगा, यह मै नही जानता, परंतु उसे सफेद चूने को वे बड़े यत्न और सावधानी के साथ रखते थे। संसार से अनभिज्ञ, अपरिणामदर्शी कोई दरिद्र बालक इसका एक क्षण भी नष्ट नही करने पाता था। इसीलिए प्रिय-पात्र और अपेक्षाकृत व्यस्त भोलानाथ को इस सयत्न वस्तु की सावधानी-पूर्वक रक्षा करने का भार मिला था, और इसी से वह बेच पर बैठकर उसे देखा करता था।
भोलानाथ लिखता था, एक मन तेल का दाम अगर चौदह रुपये, नौ आने, तीन पाई है तो…? ‘अरे बाप रे बाप’ इसके बाद बड़ा शोर-गुल मचा। पार्वती जोर से ठहाका मारकर ताली बजाकर जमीन पर लोट गई। सोये हुए गोविंद पंडित अपनी लाल-लाल आंखे मीचते हुए घबराकर उठ खड़े हुए; देखा कि पेड़ के नीचे लड़को का दल कतार बांधकर एक साथ ‘हो-हो’ शब्द करता हुआ दौड़ा चला जा रहा है और इसी समय दिखाई पड़ा कि टूटे बेच के ऊपर एक जोड़ा पांव नाच रहा है; और चूने मे ज्वालामुखी का विस्फोट-सा हो रहा है। चिल्लाकर पूछा-‘क्या है-क्या है-क्या है रे?’ उत्तर देने के लिए केवल पार्वती थी। पर वह उस समय जमीन पर लेटी हुई ताली बजा रही थी। पंडितजी का विफल प्रश्न क्रोध मे परिवर्तित हो गया-‘क्या है-क्या है-क्या है रे?’ इसके बाद श्वेत मूर्ति भोलानाथ चूना ठेलकर खड़ा हुआ। पंडितजी ने और चिल्लाकर कहा-‘शैतान का बच्चा, तू ही है-तू ही उसके भीतर है?’
‘आं-आं-आं-’
‘फिर?’
‘देवा साले ने -ठेलकर-आं-आं-इबारती-’
‘फिर हरामजादा?’
परंतु क्षण-भर मे सारा व्यापार समझकर चटाई पर बैठकर पूछा-‘देवा तुझे धक्के से गिराकर भागा है?’
भूलो अब और रोने लगा-‘आं-आं-आं’ इसके बाद कुछ क्षण चूने की झाड़, पोछ हुई, किंतु श्वेत और श्याम के मिल जाने के कारण छात्र-सरदार भूत की भांति मालूम पड़ने लगा ौर तब भी उसका रोना बंद नही हुआ।
पंडितजी ने कहा-‘देवा धक्के से गिराकर चला गया, अच्छा।’
पंडितजी ने पूछा-‘लड़के कहां है?’
इसके बाद लड़को के दल ने रक्त-मुख हांफते-हांफते लौटकर खबर दी कि ‘देवा को हम लोग नही पकड़ सके। उफ! कैसा ताक के ढेला मारता है!’
‘पकड़ नही सके?’
एक और लड़के ने पहले कही हुई बात को दुहराकर कहा-‘उफ! कैसा!’
‘थोड़ा चुप हो!’
वह दम घोटकर बगल मे बैठ गया। निष्फल क्रोध से पहले पंडितजी ने पार्वती को खूब धमकाया,
फिर भोलानाथ का हाथ पकड़कर कहा-‘चल एक बार जमींदार की कचहरी मे कह आवे।’
इसका तात्पर्य यह है कि जमीदार मुखोपाध्यायजी के निकट उनके पुत्र के आचरण की नालिश करेगे।
उस समय अंदाजन तीन बजे थे। नारायण मुखोपाध्यायजी बाहर बैठकर गड़गड़े पर तमाखू पीत थे और एक नौकर हाथ मे पंखा लेकर हवा झल रहा था। छात्र के सहित असमय मे पंडितजी के आगमन से विस्मित होकर उन्होने कहा-‘क्या गोविंद है?’
गोविंद जाति के कायस्थ थे सो झुककर प्रणाम किया और भूलो को दिखाकर सारी बाते सविस्तार वर्णन की। मुखोपाध्यायजी ने विरक्त होकर कहा-‘ तब दो देवदास को हाथ से बाहर जाता हुआ देखता हूं।’
‘क्या करूं, अब आप ही आज्ञा दं!’
‘क्या जानूं? जो लोग पकड़ने गए, उनको ढेलो से मार भगाया।’
वे दोनो आदमी कुछ क्षण तक चुप रहे। नारायण बाबू ने कहा -‘घर आने पर जो कुछ होगा, करूंगा।’
गोविंद छात्र का हाथ पकड़कर पाठशाला लौट आए तथा मुख और आंख की भाव भंगिमा से सारी पाठशाला को धमकाकर प्रतिज्ञा की कि यद्यपि देवदास के पिता उस गांव के जमीदार है, फिर भी वे उसको अब पाठशाला मे नही घुसने देगे। उस दिन की छुट्टी समय से कुछ पहले ही हो गयी। जाने के समय लड़को मे अनेको प्रकार की आलोचनाएं और प्रत्यालोचनाएं होती रही।
एक दूने कहा-‘उफ! देवा कितना मजबूत है!’
दूसरे ने कहा-‘भूलो को अच्छा छकाया!’
‘उफ! कैसा ताककर ढेला मारता था!’
एक दूसरे ने भूलो का पक्ष लेकर कहा-‘भूलो इसका बदला लेगा, देखना!’
‘हिश्! वह अब पाठशाला मे थोड़े ही आएगा जो कोई बदला लेगा।’
इसी छोटे दल के एक ओर पार्वती भी अपनी पुस्तक और स्लेट लेकर घर आ रही थी। पास के एक लड़के का हाथ पकड़ पूछा-‘मणि, देवदास को क्या सचमुच ही अब पाठशाला नही आने देगे?’
मणि ने कहा-‘नही, किसी तरह नही आने देगे।’ पार्वती हट गई, उसे यह बातचीत बिलकुल नही सुहायी। पार्वती के पिता का नाम नीलकंठ चक्रवर्ती है। चक्रवर्ती महाशय जमीदार के पड़ोसी है, अर्थात
मुखोपाध्याय जी के विशाल भवन के बगल मे ही उनका छोटा-सा पुराने किते का मकान है। उनके बारह बीघे खेती-बारी है, दो चार घर जजमानी है, जमीदार के घर से भी कुछ-न-कुछ मिल जाया करता है। उनका परिवार सुखी है और दिन अच्छी तरह से कट जाता है।
पहले धर्मदास के साथ पार्वती का सामना हुआ। वह देवदास के घर का नौकर था! एक वर्ष की अवस्था से लेकर आठ वर्ष की उम्र तक वह उसके साथ है; पाठशाला पहुंचा आता है और छुट्टी के समय घर पर ले आता है, यह कार्य वह यथानियम प्रतिदिन करता है तथा आज भी इसीलिए पाठशाला गया। पार्वती को देखकर उसने कहा-‘पत्तो, तेरा देव दादा कहां है?’
‘भाग गये।’
धर्मदास ने बड़े आश्चर्य से कहा-‘भाग! क्यो’
फिर पार्वती ने भोलानाथ की दुर्दशा की कथा को नए ढंग से स्मरण कर हंसना आरंभ किया-‘देव दादा-हि-हि-हि-एक बार ही चूने की ढेर मे हि-हि-हूं-हूं-एकबागी धर्म, चित्त कर दिया..’
धर्मदास ने सब बाते न समझकर भी हंसी देखकर थोड़ा-सा हंस दिया, फिर हंसी रोककर कहा‘
कहती क्यो नही पत्तो, क्या हुआ?’
‘देवदास ने भूलो को धक्का देकर चूने मे गिरा…हि-हि-हि!’
धर्मदास इस बार सब समझ गया और अत्यंत चिंतित होकर कहा-‘पत्तो, वह इस वक्त कहां है, तुम जानती हो?’
‘तू जानती है, कह दे। हाय! हाय उसे भख लगी होगी।’
‘भूख लगी होगी, पर मै कहूंगी नही।’
‘क्यो नही कहेगी?’
‘कहने से मुझे बहुत मारेगे। मै खाना दे आऊंगी।’
धर्मदास ने कुछ असंतुष्ट होकर कहा-‘तो दे आना और संझा के पहले ही घर भुलावा देकर ले आना।’
‘ले आंऊंगी।’
घर पर आकर पार्वती ने देखा कि उसकी मां और देवदास की मां ने सारी कथा सुन ली है। उससे भी सब बाते पूछी गयी। हंसकर, गंभीर होकर उससे जो कुछ कहते बना, उसने कहा। फिर आंचल मे फरूही बांधकर वह जमीदार के एक बगीचे मे घुसी। बगीचा उन लोगो के मकान के पास था और इसी मे एक ओर एक बंसवाड़ी थी। वह जानती थी कि छिपकर तमाखू पीने के लिए देवदास ने इसी बंसवाड़ी के बीच एक स्थान साफ कर रखा है। भागकर छिपने के लिए यही उसका गुप्त स्थान था। भीतर जाकर पार्वती ने देखा कि बांस की झाड़ी के बीच मे देवदास हाथ मे एक छोटा-सा हुक्का लेकर बैठा है और बड़ो की तरह धूम्रपान कर रहा है। मुख बड़ा गंभीर था, उससे यथेष्ट दुर्भावना का चिन्ह प्रकट हो रहा था। वह पार्वती को आयी देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ, किंतु बाहर प्रकट नही किया। तमाखू पीते-पीते कहा ‘आओ।’
पार्वती पास आकर बैठ गयी। आंचल मे जो बंधा हुआ था, उस पर देवदास की दृष्टि तत्क्षण पड़ी।
कुछ भी न पूछकर उसने पहले उसे खोलकर खाना आरंभ करते हुए कहा-‘पत्तो पंडितजी ने क्या किया?’
‘बड़े चाचा से कहा दिया।’
देवदास ने हुंकारी भरकर, आंख तरेरकर कहा-‘बाबूजी से कहा दिया?’
‘हां।’
‘उसके बाद?’
तुमको अब आगे से पाठशाला नही जाने देगे।
‘मै भी पढ़ना नही चाहता।’
इसी समय उसका खाद्य-द्रव्य प्रायः समाप्त हो चला। देवदास ने पार्वती के मुख की ओर देखकर कहा‘सं देश दो।’
‘संदेश तो नही लायी हूं।’
‘पानी कहां पाऊंगी?’
देवदास ने विरक्त होकर कहा-‘कुछ नही है तो आयी क्यो? जाओ, पानी ले आओ।’
उसका रूखा स्वर पार्वती को अच्छा नही लगा। उसने कहा ‘मैन नही जा सकती, तुम जाकर पी आओ।’
‘मै क्या अभी जा सकत हूं?’
‘तब क्या यही रहोगे?’
‘यही पर रहूंगा, फिर कही चला जाऊंगा।’
पार्वती को यह सब सुनकर बड़ा दुख हुआ। देवदास का यह आपत्य वैराग्य देखकर और बातचीत सुनकर उसकी आंखो मे जल भर आया;-कहा मै भी चलूंगी!
‘कहां?’ मेरे साथ? भला यह क्या हो सकता है? पार्वती ने फिर सिर हिलाकर कहा-‘चलूंगी’
‘नही, यह नही हो सकता। तुम पहले पानी लाओ।’
पार्वती ने फिर सिर हिलाकर कहा-चलूंगी!
पहले पानी ले आओ।
‘मैन नही जाऊंगी, तुम भाग जाओगे।’
‘नही, भागूंगा नही।’
परंतु पार्वती इस बात पर विश्वास नही कर सकी, इसी से बैठी रही। देवदास ने फिर हुक्म दिया‘जाओ, कहता हूं।’
‘मै नही जा सकती।’
क्रोध से देवदास ने पार्वती का केश खीचकर धमकाया। ‘जाओ, कहता हूं’
पार्वती चुप रही। फिर उसने उसकी पीठ पर एक घूंसा मारकर कहा-‘नही जाओगी’
पार्वती ने रोते-रोते कहा-‘मै किसी तरह नही जा सकती।’
देवदास एक ओर चला गया। पार्वती भी रोते-रोते सीधी देवदास के पिता के सम्मुख आकर खड़ी हो गयी। मुखोपाध्यायजी पार्वती को बहुत ह्रश्वयार करते थे। उन्होने कहा-‘पत्तो, रोती क्यो है।’
‘देवदास ने मारा है।’
‘वह कहां है?’
‘इसी बंसीवाड़ी मे बैठकर तमाखू पी रहे है।’
एक तो पंडितजी के आगमन से वह क्रोधित होकर बैठे थे, अब यह खबर पाकर वे एकदम आग-बबूला हो गये। कहा-‘देवा तमाखू भी पीता है?’
‘हां, पीते है, बहुत दिनो से पीते है। बंसवाड़ी के बीच मे उनका हुक्का छिपाकर रखा हुआ है।’
‘इतने दिन तक मुझसे क्यो नही कहा?’
‘देव दादा मारने को कहते थे।’
वास्तव मे यह बात सत्य नही थी। कह देने से देवदास मार खाता, इसी से उसने यह बात नही कही थी। आज वही बात केवल क्रोध के वशीभूत होकर उसने कहा दी। इस समय उसी वयस केवल आठ वर्ष की थी। क्रोध अभी अधिक था; किंतु इसी से उसकी बुद्धि-विवेचना नितांत अल्प नही थी। घर जाकर वह बिछौने पर लेट गई और बहुत देर तक रोने-धोने के बाद सो गयी। उस रात को उसने खाना भी नही खाया।
दूसरे दिन देवदास ने बड़ी मार खायी। उसे दिन भर घर मे बंद रखा गया। फिर जब उसकी माता बहुत रोने-धोने लगी, तब देवदास को छोड़ दिया गया। दूसरे दिन भोर के समय उसने भागकर पार्वती के घर की खिड़की के नीचे आकर खड़े होकर उसे बुलाया-‘पत्तो, पत्तो!’
पार्वती ने खिड़की खोलकर कहा-‘देव दादा!’
देवदास न इशारे से कहा ‘जल्दी आओ।’
दोनो के एकत्र होने पर देवदास ने कहा ‘तुमने तमाखू पीने की बात क्यो कह दी’
‘तुमने मारा क्यो’
‘तुम पानी लेने क्यो नही गयी?’
पार्वती चुप रही। देवदास ने कहा- ‘तुम बड़ी गदही हो, अब कभी मत कहना।’
पार्वती ने सिर हिलाकर कहा-‘नही कहूंगी’
‘तब चलो, बांस से बंसी काट लाये। आज बांध मे मछली पकड़नी होगी।’
बंसवाड़ी के निकट एक नोना का पेड़ था, देवदास उस पर चढ़ गया। बहुत कष्ट से बांस की एक नाली नवाकर, पार्वती को पकड़ने के लिए देकर कहा-‘देखो, इसे छोड़ना नही, नही तो मै गिर पड़ंगा।’
पार्वती उसे प्राणपण से पकड़े रही। देवदास उसे पकड़कर, नोना की एक डाल पर पांव रखकर बंसी काटने लगा। पार्वती ने नीचे से कहा-‘देव दादा, पाठशाला नही जाओगे?’
‘नही।’
‘बड़े चाचा तुम्हे भेजेगे तब?’
‘बाबू जी ने खुद ही कहा है कि अब मै वहां नही पढ़ूंगा। पंडितजी ही मकान पर आवेगे।’
पार्वती कुछ चिंतित हो उठी। फिर कहा-‘कल से गरमी की वजह से पाठशाला सुबह की हो गयी है,
अब मै जाऊंगी।’
देवदास ने ऊपर से आंख लाल करके कहा-‘नही, यह नही हो सकता।’
इस समय पार्वती थोड़ा अन्यमनस्क-सी हो गई और नोना की डाल ऊपर उठ गयी, साथ-ही-साथ देवदास नोना की डाल से नीचे गिर पड़ा। डाल अधिक ऊंची नही थी, इससे ज्यादा चोट नही आयी, किंतु शरीर के अनेक स्थान छिल गए। नीचे आकर क्रुद्ध देवदास ने एक सूखी कइन लेकर पार्वती की पीठ के ऊपर, गाल के ऊपर और जहां-तहां जोर से मारकर कहा-‘जा, दूर हो जा।’
पहले पार्वती स्वयं ही लज्जित हुई थी, पर जब छड़ी-पर-छड़ी क्रम से पड़ने लगी, तो उसने क्रोध और अभिमान से दोनो आंखें अग्नि की भांति लाल-लाल कर रोते हुए कहा-‘मै अभी बड़े चाचा के पास जाती हूं।’
देवदास ने क्रोधित होकर और एक बार मारकर कहा-‘जा, अभी जाकर कह दे, मेरा कुछ नही होगा।’
पार्वती चली गई। जब वह दूर चली गई-तब देवदास ने पुकारा-‘पत्तो।’ पार्वती ने सुनी-अनसुनी कर दी और भी जल्दी-जल्दी चलने लगी। देवदास ने फिर बुलाया-‘ओ पत्तो, जरा सुन जा!’
पार्वती ने जवाब नही दिया। देवदास ने विरक्त होकर थोड़ा चिल्लाकर आप-ही-आप कहा-जाकर मरने दो।
पार्वती चली गई। देवदास ने जैसे-तैसे करके दो-एक बंसी काट ली। उसका मन खराब हे गया था।
रोते-रोते पार्वती मकान पर लौट आई। उसके गाल के ऊपर छड़ी के नीले दाग की सांट उभर आई थी,
पहले ही उस पर दादी की नजर पड़ी। वे चिल्ला उठी-‘बार बे बाप! किसने ऐसा मारा है, पत्तो?’
आंख मीचते-मीचते पार्वती ने कहा-पंडितजी ने।’
दादी ने उसे लेकर अत्यंत कु्रद्ध होकर कहा-‘चल तो, एक बार नारायण के पास चले, वह कैसा पंडित है। हाय-हाय! बच्ची के एकदम मार डाला!’
पार्वती ने पितामही के गले से लिपटकर कहा-चल!’
मुखोपाध्यायजी के निकट आकर पितामही ने पंडितजी के मृत पुरखा-पुरखनियो को अनेको प्रकार से भला-बुरा कहकर तथा उनकी चौदह पीढ़ियो के नरक मे डालकर, अंत मे स्वयं गोविंद को बहुत तरह से गाली-गुफते देकर कहा-‘नारायण, देखो तो उसकी हिम्मत को! शूद्र होकर ब्राह्मण की कन्या के शरीर पर हाथ उठाता है! कैसा मारा है, एक बार देखोे! यह कहकर वृद्धा गाल के ऊपर पड़े हुए नीले दाग को अत्यंत वेदना के साथ दिखाने लगी।’
नारायण बाबू ने तब पार्वती से पूछा-‘किसने मारा है, पत्तो?’
पार्वती चुप रही। तब दादी ने और एक बार चिल्लाकर कहा-‘और कौन मारेगा सिवा उस गंवार पंडित के!’
‘क्यो मारा है?’
पार्वती ने इस बार भी कुछ नही कहा। मुखोपाध्याय महाशय ने समझा कि किसी कुसूर पर मारा है, लेकिन इस तरह मारना उचित नही। प्रकट मे भी यही कहा। पार्वती ने पीठ खोलकर कहा-‘यहां भी मारा है।’
पीठ के दाग और भी स्पष्ट तथा गहरे थे। इस पर वे दोनो ही बड़े क्रोधित हुए। ‘पंडितजी के बुलाकर कैफियत तलब की जाएगी।’ मुखोपाध्यायजी ने यही अपनी राय जाहिर की। इस प्रकार स्थिर हुआ कि ऐसे पंडित के निकट लड़के-लड़कियो को भेजना उचित नही।
यह निश्चित सुनकर पार्वती प्रसन्नतापूर्वक दादी की गोद मे चढ़कर घर लौट आयी। घर पहुंचे पर पार्वती माता की जिरह मे पड़ी। उन्होने बैठकर पूछा-‘क्यो मारा है?’
पार्वती ने कहा-‘झूठ-ही-मूठ मारा है।’
माता ने कन्या का कान खूब जोर से मलकर कहा-‘झूठ-मूठ कोई मार सकता है?’
उसी समय दालान से सास जा रही थी, उन्होने घर की चौखट के पास आकर कहा-‘बहू, मां होकर भी तुम झूठ-मूठ मार सकती हो और वह निगोड़ा नही मार सकता?’ बहू ने कहा-‘झूठ-मूठ कभी नही मारा है। बड़ी भली लड़की है, जो कुछ नही किया और उन्होने मारा!’
सास ने विरक्त होकर कहा-‘अच्छा यही सही, पर इसे मै पाठशाला नही जाने दूंगी।’
‘लिखना-पढ़ना नही सीखेगी?’
‘क्या होगा सीखकर बहू? एक-आध चिट्ठी-पत्री लिख लेना, रामायण-महाभारत पढ़ लेना ही काफी है। फिर तुम्हारी पत्तो को न जजी करनी है और न वकील होना है।’
अंत मे बहू चुप हो गई। उस देवदास ने बहुत डरते-डरते घर मे प्रवेश किया। पार्वती ने आदि अंत तक सारी घटना अवश्य ही कह दी होगी, इसमे उसे कोई संदेह नही था। परंतु घर आने पर उसका लेशमात्र भी आभास न मिला, वरन मां से सुना कि आज गोविंद पंडितजी ने पार्वती के खूब मारा है, इसी से अब वह भी पाठशाला नही जाएगी। इस आनंद की अधिकता से वह भली-भांति भोजन भी नही कर सका। किसी तरह झटपट खा-पीकर दौड़ा हुआ पार्वती के पास आया और हांफते-हांफते कहा-‘तुम अब पाठशाला नही जाओगी?’
‘नही।’
‘कैसे?’
‘मैने कहा कि पंडितजी मारते है।
देवदास एक बार हंसा, उसकी पीठ ठोककर कहा कि उसके समान बुद्धिमती इस पृथ्वी पर दूसरी नही है। फिर उसने धीरे-धीरे पार्वती के गाल पर पड़े हुए नीले दाग ही सयत्न परीक्षा कर, निःश्वास फेककर कहा-‘अहा!’
पार्वती ने थोड़ा हंसकर उसके मुख की ओर देखकर कहा-‘क्यो?’
‘बड़ी चोट लगी न पत्तो?’
पार्वती ने सिर हिलाकर कहा-‘हूं!’
‘तुम क्यो ऐसा करती हो? इसी से तो क्रोध आता है और इसीलिए मारता भी हूं।’
पार्वत की आंखो मे जल भर आया। मन मे आया कि पूछे कि क्या करे परंतु पूछ नही सकी।
देवदास ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा-‘अब ऐसा कभी नही करना-अच्छा!’
पार्वती ने सिर हिलाकर कहा-‘नही करूंगी।’
देवदास ने और बार पीठ ठोककर कहा-‘अच्छा, तब मै कभी तुमको नही मारूंगा।’
दिन पर दिन बीतता जाता था-और इन दोनो बालक-बालिकाओ के आनंद की सीमा नही थी। सारे दिन वे इधर-उधर घूमा करते थे, संध्या के समय लौटने पर डांट-डपट के अतिरिक्त मार-पीट भी खूब पड़ती थी। फिर सुबह होते ही घर से निकल भागते थे और रात को आने पर मारपीट और घुड़की सहते थे। रात मे सुख की नीद सोते; फिर सवेरा होते ही भागकर खेल-कूद मे जा लगते। इसका दूसरा कोई संगी-साथी न था, जरूरत भी नही थी। गांव मे उपद्रव और अत्याचार करने के लिए यही दोनो काफी थे। उस दिन आंखे लाल किए सारे तालाब को मथकर पंद्रह मछलियां पकड़ी और योग्यतानुसार आपस मे हिस्सा लगाकर घर लौटे। पार्वती की माता ने कन्या को मार-पीठकर घर मे बंद कर दिया। देवदास के विषय मे ठीक नही जानता; क्योकि वह इन सब बातो को किसी प्रकार प्रकट नही करता। जब पार्वती रो रही थी, उस समय दो या ढाई बजे थे। देवदास ने आकर एक बार खिड़की के नीचे से बहुत मीठे स्वर से बुलाया-‘पत्तो, ओ पत्तो! पार्वती ने संभवतः सुना, किंतु क्रोधवश उत्तर नही दिया। तब उसने एक निकटवर्ती चम्पा के पेड़ पर बैठकर सारा दिन बीता दिया। संध्या के समय धर्मदास समझा-बुझाकर बड़े परिश्रम से उसे उतारकर घर पर लाया।’
यह केवल उस दिन हुआ। दूसरे दिन पार्वती भोर से ही देव दादा के लिए बेचैन हो रही थी, लेकिन देवदास नही आया। वह पिता के साथ पास के गांव मे निमंत्रण मे गया हुआ था। देवदास जब नही आया तो पार्वती उदासीन मन से घर से बाहर निकली। कल ताल मे उतरने के समय देवदास ने पार्वती को तन रुपये रखने के लिए दिये थे कि कही खो न जाएं। उन तीनो रुपयो को उसने आंचल की छोर मे बांध लिया था। उसने आंचल को हिरा-फिराकर और स्वयं इधर-उधर घूमकर कई क्षण बिताए। कोई संगी-साथी नही मिला, क्योकि उस समय प्रातःकाल की पाठशाला थी। पार्वती तब दूसरे गांव मे गई।
वहां मनोरमा का मकान था। मनोरमा पाठशाला मे पढ़ती थी, उसकी उम्र कुछ बड़ी थी। परंतु वह पार्वती की सखी थी। बहुत दिनो से आपस मे भेट नही हुई थी। आज पार्वती ने अवकाश पा उसके घर पर जाकर पुकारा-‘मनो घर मे है?’
‘पत्तो?’
‘हां-मनो कहां है बुआ?’
L
‘वह पाठशाला गई है-तुम नही जाती?
‘मै पाठशाला नही जाती, देव दादा भी नही जाते।’
मनोरमा की बुआ ने हंसकर कहा-‘तब तो अच्छा है, तुम भी पाठशाला नही जाती और देव दादा भी नही।’
‘नही, हम लोग कोई नही जाते।’
‘अच्छी बात है, पर मनो पाठशाला गई है।’
बुआ ने बैठने के लिए कहा, पर वह बैठी नही, लौट आयी। रास्ते मे रसिकपाल की दुकान के पास तीन वैष्णवी तिलक-मुदा लगाये, हाथ मे खंजड़ी लिये भिक्षा मांग रही थी। पार्वती ने उन्हे बुलाकर कहा – ‘ओ वैष्णवी तुम लोग गाना जानती हो?’
एक ने फिरकर देखा और कहा – ‘जानती हूं, क्या है बेटी?’
‘तब गाओ!’ तीनो खड़ी हो गयी। एक ने कहा – ‘ऐसे कैसे गाना होगा, भिक्षा देनी होगी। चलो तुम्हारे घर पर चलकर गायेगे।’
‘नही, यही गाओ।’
‘पैसा देना होगा!’
पार्वती ने अपना आंचल दिखाकर कहा – ‘पैसा नही रुपया है।’
आंचल मे बंधा रुपया देखकर वे लोग दुकान से कुछ दूर पर जाकर बैठी। फिर खंजड़ी बजाकर, गले से गला मिलाकर तीनो ने गाना गाया। क्या गाया, उसका अर्थ था, यह सब पार्वती ने कुछ भी नही समझा। इच्छा करने पर भी वह नही समझ सकती थी। लेकिन उसी क्षण उसका मन देव दादा के पास खिंच गया।
गाना समाप्त करके एक वैष्णवी ने कहा – ‘क्या अब भिक्षा दोगी, बेटी?’
पार्वती ने आंचल की गांठ खोलकर उन लोगो को तीनो रुपये दे दिये। तीनो आवक् होकर उसके मुख की ओर कुछ क्षण देखती रही।
एक ने कहा – ‘किसका रुपया है, बेटी?’
‘देव दादा का।’
‘वे तुम्हे मारेगे नही?’
पार्वती ने थोड़ा सोचकर कहा – ‘नही।’
एक ने कहा – ‘जीती रहो।’
पार्वती ने हंसकर कहा – ‘तुम तीनो जने का ठीक-ठीक हिस्सा लग गया न?’
तीनो ने सिर हिलाकर कहा – ‘हां, मिल गया। राधारानी तुम्हारा भला करें।’ यह कहकर उन लोगो ने आंतरिक कामना की कि इस दानशीलता छोटी कन्या को कोई दंड-भोग न करना पड़े। पार्वती उस दिन जल्दी ही मकान लौटी। दूसरे दिन प्रातःकाल देवदास से उसकी भेट हुई। उसके हाथ मे एक परेता था, पर गुड्डी नही थी, वह खरीदनी होगी। पार्वती से कहा – ‘पत्तो रुपया दो!’
पार्वती ने सिर झुकाकर कहा – ‘रुपया नही है।’
‘क्या हुआ?’
‘वैष्णवी को दे दिया, उन लोगो ने गाना गया था।’
‘सब दे दिया?’
‘हां। सब तीन ही रुपये तो थे!’
‘दुर पगली, क्या सब दे देना था?’
‘वाह! वे लोग जो तीन जनी थी, तीन रुपये न देती तो तीनो का कैसे ठीक हिस्सा लगता?’
देवदास ने गंभीर होकर कहा – ‘मै होता तो दो रुपये से ज्यादा न देता।’ यह कहकर उसने परेता की मुठिया से मिट्टी के ऊपर चिन्हाटी खीचते-खीचते कहा – ‘ऐसा होने से उनमे प्रत्येक को दस आना, तेरह गंडा एक कौड़ी का हिस्सा पड़ता।’
पार्वती ने इबारती तक सवाल सीखे है। पार्वती की इस बात से प्रसन्न होकर कहा – ‘यह ठीक है।’
पार्वती ने देवदास का हाथ पकड़कर कहा – मैने सोचा था कि तुम मुझे मारोगे देव दादा!’
देवदास ने विस्मित होकर कहा – ‘मारूंगा क्यो?’
‘वैष्णवी लोगो ने कहा था कि तुम मारोगे।’
यह बात सुनकर देवदास ने खूब प्रसन्न हो पार्वती के कंधे पर भार देकर कहा – ‘दुर! कभी अपराध करने से क्या मे मारता हूं?’
देवदास ने संभवतः मन मे सोचा था कि पार्वती का यह काम उसके पीनल कोड के अंतर्गत नही है, क्योकि तीन रुपये तीन आदमियो के बीच ठीक-ठीक तकसीम कर दिये। विशेषतः जिन वैष्णवी लोगो ने पाठशाला मे इबारती सवाल नही पढ़ा है, उन्हे तीन रुपये के बदले दो रुपये देना उनके प्रति भारी अत्याचार करना था। फिर वह पार्वती का हाथ पकड़कर छोटे बाजार की ओर गुड्डी खरीदने के लिए चला गया। परेता को वही एक झाड़ी मे छिपा दिया।
इसी तरह एक वर्ष कट गया, किंतु अब और नही कटना चाहता। देवदास की माता ने शोर-गुल मचाया।
स्वामी को बुलाकर कहा ‘कि देवा तो एकदम मूर्ख हरवाहा हो गया, इसका कोई बहुत जल्द उपाय करो।’
उन्होने सोचकर कहा – ‘देवा को कलकत्ता जाने दो। नगेन्द्र के घर रहकर वह खूब अच्छी तरह लिख-पढ़ सकेगा।’
नगेन्द्र बाबू संबंध मे देवदास के मामा है। यह बात सबने सुनी। पार्वती यह सुनकर बहुत चिंतित हुई। देवदास को अकेले मे पाकर उसका हाथ पकड़कर हिलाते-हिलाते पूछा – ‘देव दादा, क्या अब तुम कलकत्ता जाओगे?’
‘किसने कहा?’
‘बड़े चाचा कहते थे।’
‘नही, मै किसी तरह नही जाऊंगा।’
‘और अगर जबरदस्ती भेजेगे?’
‘जबरदस्ती!’
इस समय देवदास ने अपने मुख का भाव ऐसा बनाया, जिससे पार्वती अच्छी तरह समझ गई कि उससे इस पृथ्वी-भर मे कोई जबरदस्ती से काम नही करा सकता। यही तो वह चाहती भी थी। अस्तु, बड़े आनंद के साथ एक बार और उसका हाथ पकड़कर इधर-उधर हिलाया और उसके मुंह की ओर देखकर कहा – ‘देखो कभी मत जाना, देव दादा!’
‘कभी नही।’
किन्तु उसकी यह प्रतिज्ञा नही रही। उसके माता-पिता ने उसे डांट डपटकर और मार-पीटकर धर्मदास के साथ कलकत्ता भेज दिया। जाने के दिन देवदास के हृदय मे बड़ा दुख हुआ। नये स्थान मे जाने के लिए उसे कुछ भी कौतुहल और आनंद नही हुआ। पार्वती उस दिन उसे किसी तरह छोड़ना नही चाहती थी। कितना ही रोई, परंतु इसे कौन सुनता है। पहले अभिमान मे कुछ देर तक देवदास से बातचीत नही की; लेकिन अंत मे जब देवदास ने बुलाकर उससे कहा – ‘पत्तो, मै जल्दी ही लौट आऊंगा; अगर न आने देगे तो भाग आऊंगा।’ तब पार्वती ने संभलकर अपने हृदय की अनेक आंतरिक बाते देवदास को कह सुनायी। इसके बाद घोड़ा-गाड़ी पर चढ़कर, पौर्टमॉन्टो लेकर, माता का आशीर्वाद और आंखो का जल बिंदु कपाल पर टीके की भांति लगाकर वह चला गया उस समय पार्वती को बहुत कष्ट हुआ; आंखो से कितनी ही जल धराएं गालो पर बहकर नीचे गिरी। उसका हृदय अभिमान से फटने लगा।
पहले कितने ही दिन उसके ऐसे कटे। इसके बाद एक दिन प्रातःकाल उठकर उसने सोचा कि सारे दिन उसके पास कोई काम करने को नही है, इसके पहले पाठशाला छोड़ने के बाद प्रातःकाल से संध्या तक झूठ-मूठ ही खेल-कूद मे कट जाता था; कितने ही काम उसे करने को रहते थे, किंतु समय नही मिलता था। पर अब सारे दिन यो ही पड़ी रहती है, एक काम भी खोजने पर नही मिलता। प्रातःकाल उठकर किसी दिन चिट्ठी लिखने बैठी-दस बज गए। माता झुंझला उठी, पितामही ने सुनकर कहा – ‘उसे लिखने दो। सुबह इधर-उधर न दौड़कर लिखते-पढ़ते रहना अच्छा है।’
जिस दिन देवदास का पत्र आता, वह पार्वती के लिए बड़े सुख का दिन होता है। सीढ़ी की देहली ऊपर बैठकर वही कागज हाथ मे लेकर सारे दिन पढ़ती रहती है। इसी भांति दो महीने बीत गये। पत्र लिखना अथवा पाना अब उतना जल्दी-जल्दी नही होता, उत्साह भी कुछ कम हो गया।
एक दिन प्रातःकाल पार्वती ने माता से कहा – ‘मां, मै फिर पाठशाला जाऊंगी।’
‘क्यो?’
पार्वती पहले कुछ विस्मित हुई, फिर सिर हिलाकर बोली – ‘मै जरूर जाऊंगी।’
‘तो जा, पाठशाला जाने से मैने कभी तुझे रोका तो नही है।’
उसी दिन दोपहर मे पार्वती ने दासी का हाथ पकड़कर, बहुत दिन से छोड़ी हुई स्लेट और पेसिल को ढूंढकर बाहर निकाला और उसी पुराने स्थान पर शांत एवं गंभीर भाव से जा बैठी।
दासी ने कहा – ‘गुरु जी, पत्तो को अब मारना नही, यह अपनी इच्छा से पढ़ने आई है, जब तक इसकी इच्छा होगी पढ़ेगी और जब इच्छा न होगी, घर चली जायेगी।’
गुरुजी ने मन-ही-मन कहा, तथास्तु! प्रकट मे कहा – ‘यही होगा।’
एक बार ऐसी इच्छा हुई कि पूछे कि पार्वती कलकत्ता क्यो नही भे
जी गयी? किंतु यह बात नही पूछी। पार्वती ने देखा कि उसी स्थान पर और उसी बेच पर छात्र-सरदार भूलो बैठा है। उसे देखकर पहले एक बार हंसी आयी, लेकिन दूसरे ही क्षण आंखो मे आंसू डबडबा आये। फिर उसे भूलो के ऊपर क्रोध आया। मन मे सोचा कि केवल उसी ने देवदास को घर से बाहर किया। इस तरह से बहुत दिन बीत गए।
बड़ी दीदी शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास
मझली दीदी शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास