बू तूँ राजी पद्मा सचदेव की कहानी | Boo Toon Raaji Padma Sachdev Ki Kahani 

बू तूँ राजी पद्मा सचदेव की कहानी डोगरी कहानी, Boo Toon Raaji Padma Sachdev Ki Kahani Dogri Story In Hindi 

Boo Toon Raaji Padma Sachdev Ki Kahani

रामनगर के मोड़ पर पहुँचते ही ताँगे खड़े हो गए। खड़े होने से पहले घोड़ों ने आगे-पीछे होकर ताँगे को अच्छी तरह झिंझोड़ दिया। ताँगे के भीतर परदे में बैठी बुआरानियाँ होशियार होकर बैठों। बुआ मसाँ छोटी और बुआ पतू बड़ी। एक नौ बरस की, दूसरी ग्यारह बरस की। दादीजी की इच्छा थी, दोनों पोतियाँ एक ही घर में जाएँ, ताकि उदास न हों। उन दिनों राजपूतों के एक तबके (वर्ग) की बेटियाँ शादी हो जाने के बाद फिर कभी मैके न आ सकती थीं। विदाई के समय मैकेवाले चंदन की लकड़ी दहेज में देते थे, ताकि मृत्यु के समय मैकेवालों की ओर से चिता में डाली जा सकें। दोनों लड़कियाँ दहेज और चंदन की लकड़ी लेकर मैके से विदा होकर आ गई थीं और अब ससुराल जा रही थीं। इस उम्र में ससुराल का कोई अर्थ नहीं होता, पर दूसरी जगह जाने का चाव तो होता ही है।

जम्मू से यह काफिला मुँहअँधेरे चला था। आठ-नौ घंटे बाद ऊधमपुर से रामनगर के मोड़ तक पहुँचा। इससे आगे ताँगे के जाने का रास्ता नहीं है। पहाड़ी इलाका है, इसलिए पालकियाँ ही बड़े आराम से जा पाती हैं।

ताँगे खड़े हो गए तो मसाँ ने पतू को कहा, “दीदी, लगता है पहुँच गए हैं।’” पतू ने अपना सालू सीधा करके बाँहों में पड़े कलीरे उठाए और गोद में रखकर बोली, “नहीं मसाँ, अभी रामनगर दूर है। पुरोहितजी कह रहे थे, आज रात हमें झनूनता गाँव में काटनी होगी। फिर सुबह आराम से नाश्ता वगैरह करके चल देंगे। ताँगा सिर्फ ऊधमपुर तक ही आता है। आगे का सफर पालकियों में तय होगा। अभी तो रामनगर का मोड़ ही आया है।”

“दीदी, पालकी में हमें बड़े झूले मिलेंगे न! सुबह से ताँगे में ही बैठे हैं, पीठ में दर्द हो रहा है। दीदी, मुझे भूख भी लगी है और प्यास भी। इतने घंटे ताँगे में बैठे-बैठे कितना थक गई हूँ मैं।”

“तुम तो सोती ही रहीं। मैं तुम्हारी गरदन बार-बार सीधी करती रही हूँ। न करती तो तुम गिर जातीं।”

उम्र तो पतू की भी ग्यारह बरस ही थी, पर वह मसाँ से दो बरस बड़ी थी और अपने होश में उसने हमेशा मसाँ को जिंदा गुडिया की तरह गोद में खिलाया है। बड़ी-बूढ़ी की तरह उसने माँ से कहा, “माँजी कहती हैं, ससुराल में भूख-प्यास सहन करनी होती है। हर समय भूख-भूख नहीं करना।”

मसाँ हैरान होकर पूछने लगी, “क्या हमारी ससुराल में पेट-भर खाना नहीं मिलेगा?”

पतू को रोना आ गया, पर उसने मसाँ को डाँटते हुए कहा, “पागलों की तरह बक-बक मत कर। अपनी ससुराल के बारे में इस तरह नहीं कहते। बापूजी ने हमें खाते-पीते जमीदारों के घर दिया है। माँजी कह रही थीं, उनके घर में दूध-दही की कमी नहीं। तीन कोठरियाँ तो भूसे से भरी ही रहती हैं। जमीन भी बहुत है। गाय, गोरू, खच्चरें, भैंसें और फिर मरदों के घोड़े ।”

ताँगे के परदे के बाहर कुछ आवाजें सुनाई पड़ रही थीं।

पतू ने मसाँ को कहा, ‘“नाइन और कहारिन आ रही लगती हैं।”

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तभी पतू की नजर मसाँ के कलीरों पर पड़ी। उसने गुस्सा होते हुए कहा, “यह क्या, तुमने फिर नारियल खा लिया। लगता है, जब मैं सो रही थी, तभी तुमने दाँव लगाया होगा।”

मसाँ को हँसी आ गई। उसने मचलकर कहा, “दीदी, सच बताऊँ, पहला नारियल तो मैंने कंडोली नगरोटे के पास पहुँचते ही खा लिया था। दूसरा मैंने तब खाया, जब घोड़ा झज्जर कोटली की चढ़ाई चढ़ रहा था। दीदी, तुम उस वक्‍त ताँगे की सीट पकड़कर घोड़े को देख रही थीं, नहीं तो मैं तुम्हें भी नारियल खाने को देती। पता है, यह कलीरा बुआ मक्खनों ने पहनाया था। मैंने देखा था, उसका नारियल बड़ा पुराना था तो भी बड़ा मीठा था।”

पतू ने मसाँ को प्यार-भरे गुस्से के साथ आँखें दिखाईं। तभी नाइन ने परदा उठाकर कहा, “नीचे उतरो बुआरानियो! शाबाश! पालकियाँ आ गई हैं। उनकी ओट में मुँह-हाथ धोकर ताजादम हो जाओ। करनैलनी ने बड़ी दूर दिया आपको। चलो-चलो। कहार भी हाथ-मुँह धोने चले गए हैं। अभी वहाँ कोई नहीं है। मियाँजी ने दो पालकियाँ मँगवाई हुई हैं।”

बुआ मसाँ यह सुनते ही कपड़े सँभालती-सँभालती रोने लग गई। उसने कहा, “मैं अकेली पालकी में नहीं बैठूँगी। दीदी के साथ बैठूँगी। अकेले में मुझे डर लगता है।”

पतू ने नाइन को कहा, “पुरोहितजी से कहो, हम दोनों एक ही पालकी में बैठेंगी।”

जम्मू के प्रसिद्ध जनरल रौनकसिह की दोनों बेटियाँ एक ही घर में ब्याहकर जा रही थीं। दोनों दामाद फौज में थे। घर बड़ा समृद्ध और डुग्गर में भी स्वर्ग कहलाने वाले गाँव रामनगर में था। भरे-पूरे घर में बेटियों को खाने-पहेनने का सुख रहेगा। इकट्ठी रहेंगी तो हमें भी संतोष रहेगा।

दोनों पालकी में बैठीं तो कहारों ने कहा, “ज्यादा हिलना-डुलना नहीं। दोनों आमने-सामने बैठ जाओ। पहाड़ी इलाका है। चढ़ाई-उतराई भी बहुत हैं। चढ़ाई में आगे की तरफ बोझ रखना और उतराई में पीछे की तरफ ।”

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पालकी में कपड़ा ऊपर-नीचे होने लगा। मसाँ ने देखा तो हँस पड़ी। उसे बड़ा अचंभा हुआ। उसने कहा, “दीदी, पालकी का कपड़ा साँस ले रहा है।”

पतू ने कहा, “आराम से बैठो। डोली न डोले। कहारों को धक्का न लगे।”

मसाँ ने पतू को पूछा, “बापूजी ने हमें कितने ट्रंक दिए हैं दीदी। उनमें वह सुत्थन भी है न, जो महारानी ने माँजी को दी थी। है न, हरे गुलबदन की सुत्थन। मैं लोहड़ी के त्योहार पर पहनूँगी।”

पतु ने कहा, “जो तेरा मन हो, पहनना, पर अभी सुत्थन तुम्हें बहुत बड़ी होगी।”

“अरी दीदी पालकी के कपड़े में एक सूराख तो है, पर उससे पूरे पहाड़ नहीं दिखाई देते। कितने सुंदर पहाड़ हैं। क्या जरा सा परदा हटाकर देख लूँ?”

पतू किसी दाना की तरह बोली, ”अब तो सारी उम्र यही पहाड़ देखने हैं। आराम से बैठी रह।”

मसाँ ने पूछा, “दीदी बात करने से तो डोली नहीं डोलती न?” पतू को हँसी आ गई। उसकी छोटी सी बहन हमेशा से सवाल करती है। मसाँ शह पाकर फिर पूछने लगी, “दीदी, माँजी कहती हैं, राजाओं की बेटियाँ ब्याही जाती हैं तो दहेज को झंडे लगते हैं। भला हमारे दहेज को क्यूँ नहीं झंडे लगे?”

पतू ने उत्तर में कहा, ”एक झंडा एक लाख रुपए के दहेज के पीछे लगता है। हमारे बापूजी के पास एक लाख रुपया कहाँ है।”

मसाँ कुछ उदास हो गई। फिर उसने पूछा, “हम भाई की शादी में जाएँगे तो क्या हमें फिर दहेज मिलेगा?”

“नहीं मुई, दहेज तो एक ही बार मिलता है। वैसे भी अब हम कभी मैके नहीं जाएँगे। तुमने देखा नहीं, छोटी पिटारी में चंदन की लकड़ी डालते समय माँजी किस तरह रो रही थीं। अब हमें कोई लकड़ी देने भी न आएगा। हम हमेशा के लिए विदा कर दी गई हैं।” उसकी आँखें भर आई। उसने घूँट भरकर याद किया। माँ ने कहा था, ”मसाँ के सामने रोना नहीं, मेरी बच्ची। यह तो अभी यह भी नहीं जानती, ससुराल क्या होती है।”

मसाँ को गुस्सा आया। उसने कहा, ”यह मुआ ससुराल कैसा रिवाज है।”

पतू ने नाराज होकर कहा, “यह गाली कहाँ सीखी? ससुराल जाकर क्या हम गाली देंगे? अच्छा नाम होगा बापूजी का।”

मसाँ चुप लगा गई, पर कितनी देर चुप बैठती। उसने बात को उड़ाते हुए पूछा, “दीदी, हम अपने दूल्हे को कैसे पहचानेंगे? मुझे तो किसी ने जीजाजी का मुँह भी नहीं देखने दिया।”

पतू ने गंभीर होकर कहा, ”ससुराल जाकर भी तुम उनके सामने नहीं पड़ोगी। वे तुम्हारे जेठ हैं।”

मसाँ हैरान हुई। उसने पूछा, “तो दीदी, तुम क्या लगोगो?”

पतू ने बचपन से माँ को गोदी में खिलाया है। उसने उसे गले लगाकर कहा, “तुम्हारी तो मैं दीदी ही रहूँगी मसाँ।”

पालकी जरा सी हिली तो कहार चिल्लाए, ”ओह बुआरानियों, आराम से बैठो। हिलो नहीं।”

नाइन और कहारिन एक ही खच्चर पर लदी हुई थीं। वे भी चिल्लाई, ”ऐ बुआ, हिलना नहीं, आराम से बैठो।”

शोर सुनकर आगे जाते दूल्हे भी मुड़कर देखने लगे। पतू पालकी में बने सूराख से देख रही थी। दोनों दूल्हे सुंदर, जवान, होशियार लग रहे थे। पतू ने सोचा, पता नहीं, बड़े दुल्हा कौन होंगे। उसे शर्म आ गई। धीरे-धीरे दोनों की आँख लग गई।

पहाड़ से बहता पानी राह में से जाकर खड्ड में गिर रहा था। एक कहार का पैर फिसलते- फिसलते रह गया। कहारों ने आगे खुली जगह देखकर वहाँ डोला उतार लिया और फिसलनेवाले कहार को गाली देने लगे, “मुए, अभी तो तुमने सोलह मकई की रोटियाँ खाई थीं। क्‍या भूखे थे?

सभी हँसने लगे तो दोनों लड़कियाँ पालकी में जग गईं। उन्होंने देखा, पालकी जमीन पर रखी है और कहार बातें कर रहे हैं।

मसाँ ने कपड़ा उठाकर कहा, ”दीदी, देखो, कितने पहाड़ हैं। दरिया भी है।”

पतू एकदम जगाने से डर गई थी। जरा सा सँभलते ही कहने लगी, “क्या दरिया नहीं देखा। क्या तवी से सुंदर है।”

पता नहीं, देविका है या तवी? पतू ने सूराख में से देखा। जरा सा आगे मोड़ पर दोनों दूल्हे सिगरेट फूँक रहे थे। एक खूब जोर से सिगरेट का कश लेता; फिर दूसरे को दे देता। दोनों मुसकराने लगते। दोनों नए-नए सिगरेट पीनेवाले लगते थे। बरतनों से लदी खच्चर ने गरदन घुमाई तो बड़े पतीले के साथ बटलोई दुनकने लगी। कहारें बातें कर रहे थे। जगानूँ गाँव दिखाई देने लगा है। “वहाँ से झनूनता गाँव जाएँगे, फिर झनोत्तेरों की बाबड़ी में नहाएँगे। वहाँ मंदिर भी है और समय भी। रात वहीं काटेंगे।” बड़े मियाँ कह रहे थे।

मसाँ व पतू सुन रही थीं। मसाँ ने पतू को कहा, “दीदी, हम भी बाबड़ी में नहाएँगे न!”

पतू ने कहा, “मसाँ, हम कहाँ सराय में ही कहीं कमरे के अंदर नहाएँगे।हम बाउड़ी में थोड़े नहा सकती हैं? हम तो दुल्हिनें हैं। सब बराती होंगे। दूल्हे और उनके रिश्तेदार। हम तो कमरे से बाहर ही नहीं निकलेंगे।”

जगानूँ में पातलियों की ढक्की उतरते हुए भी बुआरानियाँ डरती रहीं, ”माँ, कैसी जगह ब्याह दिया हमें।’” उन्होंने महसूस किया, पर कहा कुछ नहीं। सफरी हुक्का पीहर कहारों की थकावट भी उतर गई थी। फिर पालकी उठाकर चलने लगे। रास्ते में जहाँ भी पहाड़ी पर कोई घर होता, छोटे-छोटे बच्चे घरों से निकल आँगन में खड़े होकर नाचने लगते :

“नई दुलिन नई दुल्हिन”

रात को झनूनता गाँव में सब ठहरे। ऊपर के कमरे में औरतें और नीचे मर्द। सुबह नहा-धोकर खाना बनानेवाले चूल्हे सुलगाकर बैठ गए। दूध आ गया। खमीरी रोटियाँ गरम कीं और कयूर सिंकने लगे। सब रामनगर की बातें कर रहे थे। सबने डटकर नाश्ता किया और धीरे-धीरे पहाड़ी रास्ता चढ़ने लगे। कठिन पहाड़ी रास्ता और खड्डों से निकलते-निकलते कहार बीच में ताजादम होने के लिए रुकते तो मसाँ और पतू भी डोली की ओट में बैठकर ठंडी हवा में खिल उठतीं। बहुएँ उतारनेवाले घर में एक पुराना बूढ़ा खाँस रहा था। अभी ससुराल की दहलीज लाँघने का मुहूर्त न था। सब लोग उस पहाड़ी घर के दालान में पसर गए। मसाँ और पतू को नाइन व कहारिन पिछवाड़े बनी एक कोठरी में ले गई। वहाँ एक पहाड़ी नाला बह रहा था।

नाइन ने कहा, “बुआ, तुम लोग नहा-धोकर कपड़े बदल लो, अभी ससुराल जाने का मुहूर्त नहीं हुआ।”

नाइन की नजर मसाँ के कलीरों पर पड़ी। कौडियों के नीचे से सूखे नारियल गायब थे, “हे भगवान्‌, कौडियाँ तो हैं, पर नारियल गायब। ननदें कलीरे उतारेंगी तो क्‍या सोचेंगी। ये कौडियाँ मैं अपने झोले में डाल लेती हूँ। नहीं तो सभी कहेंगे, भूखी बहुएँ आई हैं।”

कहारिन बोली, “तेरा पेट तो खूब भरा है, तभी तो कौडियों पर नजर गई है। चलो बुआरानियो, कुछ थोड़ा सा चख लो। कहाँ नई बहुओं को कयूर मिलेंगे, पर थोड़ा सा कौर ही लेना।”

कहीं दूर से बधाइयाँ गाई जा रही थीं। पहाड़ों में आवाज दूर से भी साफ सुनाई देती है। कहते हैं, पहाड़ भी साथ गाते हैं। ससुराल ऊपर पहाड़ी पर थी, पर आवाजें जैसे चाँदनी में छनकर आ रही थीं :

न्यौरा बज्जै लाला पलंगे दे पावै

छुनकनी मुनकनी बौट्टी लेई आवे

अज्ज सुहामनी रात

कलेहार न्यौरा बज्जै

दोनों लड़कियाँ एक-दूसरे को देखने लगीं। ब्याह हो जाने के उछाह के साथ-साथ एक भय भी सिर उठा रहा था। फिर ससुराल की ढक्की चढ़ते, पूनियों पर पैर रखते, ड्योढ़ी तक पहुँचते पता ही नहीं चला; क्या हो रहा है। फौजी बाजा, कोई डोगरी, पहाड़ी धुन बजा रहा था। रुपयों की होली में और गुल्लरे की बटलोई में हाथ डालते समय स्त्रियों का मंगलगान कान में पड़ रहा था:

तेरे स्हौरे ने लाड लडाएआ

दम्में बोरिऐं हत्थ पोआए आ

मुँह जुठराने के लिए क्यूरों का थाल आया तो माँ को याद आया, खाना नहीं है, बस, जरा सा छूना भर है। अब भूख भी किसे रही थी। वैसे भी थकान और नींद के मारे बुरा हाल था। इसके बाद बेहोशी में ही दोनों ने कोई पचास जोड़ी पाँवों पर माथा नवाया।

देवर की गोद में बैठने की रस्म होने लगी तो औरतों ने कहा, ”देवरजी, भौजाई भी है और साली भी, बस, बैठ जाओ गोदी में।”

सब हँसने लगे। दुनिया बस गई।

इस शादी के पंद्रह बरस बाद जम्मू से फिर एक बुआ रानी चनैनी के राजा के संग ब्याही गई। महाराजा प्रतापसिंह की बेटी को महाराजा हरिसिंह ने पंद्रह झंडों का दहेज दिया। फिर बहन की पालकी के आगे खड़े होकर पूछा, ”बुआरानी, कोई कमी तो नहीं रह गई?”

बुआरानी की भर्राई सी आवाज बड़ी मुश्किल से समझ आई। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा,

“मुझे बुलाना महाराज।”

महाराज ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ”कल रात का भात आप यहीं खाना।”

चमत्कार हो गया। राजपूतों की ब्याही बेटियाँ अब मैके भी आ सकेंगी। रास्ता खुल गया। महाराजा हरिसिंहजी के गुणगान होने लगे। खबरें सब जगह फैल गईं। मसाँ और पतू के भाइयों ने भी सुनी तो घोड़े कस लिये।

घर में कहा, “आज रात ऊधमपुर में काटेंगे और परसों सुबह अपनी बहनों के पास ही नाश्ता करेंगे।”

घोड़े दौड़ने लगे। कुछ खयालों में, कुछ सड़कों पर।

रामनगर में अभी यह खबर न पहुँची थी। सुबह काम्मे गोरू खोलकर गए तो मसाँ और पतू दोनों बहनें पिछवाड़े जाकर गोबर पाथने लगीं। मसाँ एक आह भरकर बोली, “बड़े भैया की रानू भी ब्याहने लायक हो गई होगी। हमारी तो दोनों बेटियाँ ब्याही गई। इसे भी अच्छा घर मिल जाए।”

पतू ने कहा, “सुना है, भाभीजी के मैकेवाले रामबन के बड़े शाह हैं। बड़े रसूखवाले हैं। अच्छे लड़कों की क्या कमी है।”

मसाँ को जैसे कुछ याद आया। गोबर मलते-मलते उसने कहा, ”दीदी, वह रामबन ही की गोली थी न, जिसे कभी-कभी माँजी महलों में मिलने जाती थीं।”

“हाँ, वो नरात्तू, तुम्हें कैसे याद आ गई? वह मामीजी के मैके की लड़की है। नौ बरस की विधवा हो गई थी। फिर रनिवास में आ गई। उन दिनों राजा के सिपाही इस तरह की अनाथ और सुंदर लड़कियों को ढूँढ़ने में घूमते रहते थे। फिर वे दरबार में लाई जातीं। रानियों के पास उनको टहल, सेवा या फिर दूसरे कामों के लिए रख लिया जाता। गरीबों की बेटियों के बदले उन्हें कुछ मिल जाता। इन लड़कियों से मिलनेवाले पहाड़ी सौगातें; कभी गुन्छियाँ, कभी कलाडियाँ, कभी मकई का आटा आदि लाते। कितनी-कितनी देर ड्योढ़ी पर बैठे रहते, कभी सारा दिन भी हो जाता।”

मसाँ हैरान होकर सुन रही थी। उसने कहा, “दीदी, सौगातें तो ज्यादा ड्यौढ़ी अफसर ही ले जाता होगा!”

“हाँ मसाँ, कुछ दिए बगैर कहीं भेंट होती होगी। फिर लड़की आती तो भी क्या सबके सामने बात हो पाती। आनेवाला पूछता, ‘बू तूँ राजी?’ (बुआ, तुम ठीक?) बुआ गरदन हिलाकर आँखों में ‘हाँ जी’ कहती और आँखों में गंगा-जमना भरकर चली जाती।”

“बू तूँ राजी?” इतनी सी बात पूछने के लिए कितनी देर बैठना पड़ता। उसने एक आह भरी।

मसाँ ने कहा, “चलो, हमसे तो वे ही भाग्यशाली हैं। हमें तो कोई यह भी पूछने नहीं आता।”

फिर मसाँ ने कुतूहलवश पूछा, “पर दीदी, ये लोग क्यों मैके नहीं जा सकती थीं?”

पतू ने कहा, ”नहीं, रनिवास में जो भी आ जाता है, वह फिर दहलीज नहीं लाँघ सकता था। कहते हैं, एक बार महाराजा प्रतापसिंहजी को अंग्रेज रेजिडेंट ने कहा था कि मेरी मेम रनिवास में जाकर रानियों से मिलना चाहती हैं। महाराजा ने कहा, हमारे धन्य भाग वे आएँ, पर हमारे यहाँ यह रिवाज है कि जो स्त्री रनिवास में आती है, वह बाहर नहीं जा सकती। फिर मेम ने आने की हिम्मत नहीं की।” इस बात पर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं और उपले पाथने लगीं।

मसाँ और गोबर लेने के लिए मुड़ी तो दूर पहाड़ियों में से उसने दो घुड़सवारों को आते देखा। उसके हाथ वहीं रुक गए। घुड़सवार तन तक ढलान में ओझल हो गए थे।

मसाँ ने बड़े चाव से पतू को कहा, “दीदी, कोई दो लोग घोड़े पर आ रहे हैं। शहर के लगते हैं।”

पतू ने हाथ से गोबर पोंछते हुए कहा, “तुम्हें ऐसे ही लगता रहता है। देखो, कोई भी नहीं है।”

उसी वक्‍त घुड़सवार फिर चढ़ाई पर आ गए थे। सूरतें तो पहचानी न जाती थीं, पर केसरी पगड़ियाँ दूर से दिखाई दे रही थीं।

पतू ने खुश होकर कहा, “उनके कंधों पर बंदूकें भी हैं। चलो, आएँगे तो हम भी अपने घर का हाल-चाल पूछेंगे।”

मसाँ ने घबसकर कहा, ”देखो दीदी, सूरज कहाँ आ गया है। अभी हमें नहा-धोकर रसोई भी बनानी है। आज बापूजी भी ऊधमपुर से आ जाएँगे। कामे भी उनके साथ हैं। खाना जल्दी तैयार होना चाहिए।’” फिर उसकी नजर अपने आप रास्ते पर घूम गई। पहाड़ी चढ़ते-उतरते घुड़सवार चाँद की तरह कभी नजर आते, कभी ओट में हो जाते। अब घुड़सवार इस तरफ आ रहे थे। पतू ने देखा तो उसके हाथ से उपला गिर गया। उसने घबराए हुए स्वर में कहा, ”मसाँ, ये तो अपने भाई लगते हैं। सारी शक्ल बापूजी की तरह है। हे राम, अगर राजा को पता चल गया तो क्या होगा?”

मसाँ उधर ही देख रही थी। उसने कहा, “देखो, छोटे पंडित को कुछ पूछ रहे हैं और उसने हमारे घर की तरफ इशारा किया है।”

“हाँ मसाँ, ये हमारे ही भाई हैं। हमारे माँ-जाए।” दोनों घबरा गईं। भाई क्या सोचेंगे, जनरल की बेटियाँ उपले पाथ रही हैं। राजा से चोरी आए होंगे तो पता नहीं क्या सजा मिलेगी। हे राम!

अब घुड़सवार चले तो इन्होंने जी भरकर उन्हें देखा। फिर एक-दूसरी का हाथ कसकर पकड़ा और पहाड़ी से छलाँग लगा दी।

**समाप्त**

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