बीरबल की खिचड़ी : अकबर बीरबल की कहानियाँ

Birbal Ki Khichadi Akbar Birbal Story In Hindi


Birbal Ki Khichadi Akbar Birbal Story In Hindi

Birbal Ki Khichadi Akbar Birbal Story In Hindi

एक रात बादशाह अकबर अपने दरबारियों को साथ लेकर सैर पर निकले. सैर करते हुए वे सभी यमुना नदी के तट पर पहुँचे.

ठंड का मौसम था. दिल्ली में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. यमुना के समानांतर टहलते हुए जाने बादशाह अकबर को क्या सूझा कि उन्होंने अपनी एक उंगली यमुना के ठंडे पानी में डाल दी.

कड़ाके की ठंड में यमुना का पानी भी बर्फ़ की भांति ठंडा हो चुका था. झटपट अपनी उंगली बाहर निकालकर अकबर बोले, “वाकई पानी बर्फ़ हो चुका है. ऐसे में यदि किसी को इसमें थोड़ी देर भी रहना पड़ जाये, तो उसकी मौत निश्चित है.”

सभी दरबारियों ने हमेशा की तरह अकबर की हाँ में हाँ मिलाई. लेकिन बीरबल चुप रहे. उनकी चुप्पी अकबर को खटक गई. उन्होंने पूछा, “कहो बीरबल! तुम क्या कहते हो?”

“जहाँपनाह! मेरे विचार में मनुष्य एक ऐसा प्राणी है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर कुछ भी कर गुजरने में सक्षम है.” बीरबल ने उत्तर दिया.

“तो क्या तुम ये मानते हो कि ऐसी कड़कड़ाती ठंड में कोई व्यक्ति सारी रात यमुना के ठंडे पानी में गुज़ार सकता है?”

“अवश्य” बीरबल बोला.

अपनी सोच से विपरीत बीरबल की यह बात अकबर को पसंद नहीं आई. उन्होंने इसे चुनौती स्वरुप लेकर आदेश दे दिया, “तो ठीक है. कल नगर में मुनादी करवा दो कि जो व्यक्ति एक पूरी रात नदी के ठंडे पानी में कमर तक डूबकर खड़ा रह लेगा, उसे ईनाम में एक हज़ार स्वर्ण मुद्रायें दी जायेगी.”

अगली सुबह पूरे नगर में यह मुनादी करवा दी गई. सबने यह मुनादी सुनी, लेकिन किसी का साहस नहीं हुआ कि इस चुनौती को स्वीकार कर सके. सारी रात यमुना के ठंडे पानी में खड़े रहना मौत को दावत देना था.

उसी नगर में एक निर्धन धोबी रहता था. पत्नि का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण उसे पैसों की अत्यधिक आवश्यकता थी. उसने जब यह मुनादी सुनी, तो वह यह करने के लिए तैयार हो गया.

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अकबर के सैनिक उसे यमुना नदी पर ले गए और उसे नदी के पानी में कमर तक डुबाकर खड़ा करने के बाद रात भर उसकी निगरानी करते रहे. वह निर्धन धोबी रात भर ठंडे पानी में खड़ा रहा.

अगली सुबह सैनिक उसे लेकर दरबार में हाज़िर हुए. अकबर हैरान थे. उन्होंने उस धोबी से पूछा, “तुम सारी रात इतने ठंडे पानी में कैसे खड़े रहे?”

धोबी ने उत्तर दिया, “हुजुर! मैं सारी रात महल में जल रहे चिराग को देखता रहा और इस तरह पूरी रात काट दी.”

यह सुनना था कि अकबर क्रोधित हो गए, “इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम महल में जलते चिराग से सारी रात गर्मी प्राप्त करते रहे. यह तो सरासर धोखा है. तुम ईनाम के नहीं बल्कि सज़ा के हकदार हो. सैनिकों इसे काल-कोठरी में डाल दो.”

बीरबल भी दरबार में उपस्थित थे. एक गरीब पर ज़ुल्म होता देख उनका ह्रदय द्रवित हो उठा. उस समय तो वे कुछ नहीं बोले. लेकिन अगले दिन दरबार में उपस्थित नहीं हुए.

उस दिन दरबार में एक आवश्यक बैठक थी. अकबर ने एक सैनिक को बीरबल को बुलाने के लिए भेजा.

सैनिक ने वापस आकर उत्तर दिया, “जहाँपनाह, बीरबल खिचड़ी बना रहे हैं. उसे खाकर दरबार में आने का संदेशा भिजवाया है.”

दोपहर हो गई, लेकिन बीरबल दरबार नहीं पहुँचे. ऐसे में अकबर को कुछ संदेह हुआ और वे स्वयं बीरबल के घर पहुँच गए. वहाँ उन्होंने देखा बाहर आंगन में एक घड़ा पेड़ पर लटका हुआ है और उसके ठीक नीचे ज़मीन पर आग जल रही है. बीरबल पास ही चारपाई पर लेटे हुए हैं.

अकबर कुछ समझ न सके. उन्होंने बीरबल से पूछा, “ये क्या कर रहे हो बीरबल?”

“जहाँपनाह, मैं खिचड़ी बना रहा हूँ.” बीरबल ने उत्तर दिया.

“ऐसे भी खिचड़ी बनाई जाती है. इतनी दूर जल रही आग से भला खिचड़ी कैसे पकेगी?”

“जहाँ पनाह! इतने दूर नदी में खड़े निर्धन धोबी को जब महल में जल रहे चिराग से गर्मी मिल सकती है. तो मेरी खिचड़ी भी पक सकती है. वह तो उसकी तुलना में आग के करीब ही है.”

अकबर को बीरबल की बात समझ में आ गई और अपने किये पर पछतावा भी हुआ. उसने फ़ौरन धोबी को रिहा कर दिया और वादा अनुसार एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ उसे ईनाम में दी.


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